“ अपनी भावी बहू को ले कर मेरे भी कुछ सपने थे, अरमान थे और बेटा अपनी पसंद से शादी करे मुझे उसमें भी कोई एतराज़ नहीं था। मगर जब ध्रुव ने मीतू यानी मैत्रीय को मेरे सामने ला कर खड़ा किया तो उस दुबली पतली , कटे बालों और ज़ींस टी शर्ट वाली लड़की में मैं अपनी बहू देख ही नहीं पा रही थी । शादी के बाद उसने इस घर को बड़ी सहजता से अपना लिया था पर मैं ना जाने क्यों उसको अपना नहीं पा रही थी । ना जाने क्यों उसकी हर छोटी बात भी मुझे नागवार हो जाती थी .” क्या मीतू अपनी सासू माँ को अपने स्नेहबँध में बांध सकी … सुनिए मालती जोशी जी की कहानी स्नेहबँध मे
कुत्तों से कौन नहीं डरता ? अच्छों – अच्छों की सिट्टी – पिट्टी गुम हो जाती है। क्योंकि जब तक कुत्ते का मूड अच्छा है , तब तक वह आपका दोस्त है । लेकिन जैसे ही उसका मूड बिगड़ा तो वह ना आव देखता है ना ताव। सब कुछ भूल जाता है । और आपको नौ दो ग्यारह होने पर मजबूर होना पड़ता है।
मीरा ने आनंद का एक अलग ही पहलू देखा । जिसमें उसे दंभी ,तानाशाह, हिप्पोक्रेट व्यक्ति नजर आया । जिसने उसकी कला की प्रशंसा ना करके उसे उससे अलग होने का हुक्म दे डाला । क्या हमारे समाज में शादी के बाद सिर्फ लड़की को ही नए परिवेश में ढलना होता है ?होता होगा। पर अब नहीं। अब जमाना बदल चुका है । यह नए दौर का जमाना है , जिसमें लड़कियाँ लड़कों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। तो फिर मीरा कैसे चुप रह सकती है ?
एक लड़की के लिए मायका क्या होता है ? सिर्फ वही जानती है । मायके के नाम से ही आँखें भर आती हैं। सारा बचपन, सखियाँ,सावन, माँ-बाबूजी, भईया, बहन आँखों में तैर जाते है।मायके जाने के नाम से ही ज़मीन पर पैर नही पड़ते है।वक्त काटे नही कटता है।क्या कोई ऐसा होगा , जो मायके न जाने की कसम खाले ? श्रुति ने मायके न जाने की कसम खाई थी। आखिर क्यों ?
जब मन से रिश्ता नहीं जुड़ता है| तब हम किसी भी रिश्ते से सामाजिक रुप से जुड़ भी जाए ,वह सिर्फ एक धोखा होता है |वह आपसे अलग भी हो जाए तो उसके प्रति कोई शोक नहीं होता इसी बात को बड़ी गंभीरता से अपनी कहानी नो सिंपैथी प्लीज मैं मालती जोशी ने प्रस्तुत किया है
पुरानी रईसी चली जाती है ,पर ठसक नहीं जाती । | इसी झूठी शान का खामियाजा भुगतना पड़ता है परिजनों को |अपनी ही संतान तब भार लगने लगती है ही इन सारी परिस्थितियों का गुबार सहना पड़ता है | करुणा की इस भूमि पर सभी दुखी होने के कारण सास और बहू में भी एक भावनात्मक रिश्ता हो जाता है इन्हीं भावनाओं को चित्रित किया गया है कहानी हम तो ठहरे परदेसी में
हमारी भारतीय समाज में पति विहीन नारी की हमेशा उपेक्षा की जाती है |हमारी मानसिकता अभी भी नहीं बदली पति कैसा भी हो स्त्री का सुहाग होता है ,किंतु उसके बिना जैसे उस स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं रहता और उसका वजूद महा शून्य में तब्दील हो जाता है इसी संदर्भ में सुनते हैं इस मार्मिक कहानी को महा शून्य को मालती जोशी जी की आवाज में
जेवर और पीहर बुढ़ापे तक इन दो चीजों का मुंह नहीं टूटता |पीहर के प्रति लगाव इतना जबरदस्त होता है कि उसे बरकरार रखने के लिए कई बार बेटियां अपना जायज हक तक छोड़ देती है| चंद्रहार कहानी में भावनाओं का ताना-बाना इसी बात को लेकर बुना गया है| कहानी ने मीनू 3 साल के बाद अपनी मां से मिलने भारत आती है | मां उसको उसकी पसंद का चंद्रहार देना चाहती है किंतु मीनू उसे लेने से इनकार कर देती है पूरी कहानी जानने के लिए सुनते हैं मालती जोशी जी की आवाज में कहानी चंद्रहार
कहानी के नायक ने बचपन से गरीबी देखी है उसने अपनी मां को दूसरे घरों में काम औरगरीबी से संघर्ष करते हुए देखा है जवान होते -होते अमीर बनने की चाहत में वह गलत कार्य करने लगता है जब मां को इस बात का पता लगता है तो वे उसका त्याग कर देती है किंतु कहानी के अंत में नायक को इस बात का एहसास होता है कि उसकी मां उसके लिए क्या है जुनैद की लिखी कहानी मां भारती मां के प्यार और त्याग की कहानी है ,अमित तिवारी जी की आवाज
पुरानी रईसी चली जाती है ,पर ठसक नहीं जाती । | इसी झूठी शान का खामियाजा भुगतना पड़ता है परिजनों को |अपनी ही संतान तब भार लगने लगती है ही इन सारी परिस्थितियों का गुबार सहना पड़ता है | करुणा की इस भूमि पर सभी दुखी होने के कारण सास और बहू में भी एक भावनात्मक रिश्ता हो जाता है इन्हीं भावनाओं को चित्रित किया गया है कहानी हम तो ठहरे परदेसी में
यूनुस खान एक क्रांतिकारी है जो लोग काफिर है उनके लिए उसके दिल में कोई हमदर्दी नहीं है लेकिन यूनुस खान को एक खून से लथपथ एक छोटी बच्ची जब दिखती है जो कि काफिर है उसका कठोर दिल भी पिघल जाता है और क्या रिश्ता है उस बच्ची और यूनुस खान के बीच में पूरी कहानी जानने के लिए सुनते हैं कृष्णा सोबती की लिखी कहानी मेरी मां कहां अमित तिवारी जी की आवाज
हरसिंगार एक अनाथालय में जीवन बिता रहे एक युवक गोविंद की कहानी है| जिसे एक घटना के पश्चात ये एहसास होता है कि उसके अनाथ जीवन में कभी उसे पूर्णता का एहसास नहीं होगा |ऐसा गोविंद क्यों सोच रहा है? इसको जानते हैं अज्ञेय जी की लिखी कहानी हरसिंगार में सुमन वैद्य जी की आवाज में
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