हमारी भारतीय समाज में पति विहीन नारी की हमेशा उपेक्षा की जाती है |हमारी मानसिकता अभी भी नहीं बदली पति कैसा भी हो स्त्री का सुहाग होता है ,किंतु उसके बिना जैसे उस स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं रहता और उसका वजूद महा शून्य में तब्दील हो जाता है इसी संदर्भ में सुनते हैं इस मार्मिक कहानी को महा शून्य को मालती जोशी जी की आवाज में
उत्तरा 50 साल की एक महिला है जिसका विवाह गिरीश से हुआ है |उसकी दो बेटियां हैं निशि और आशु |उत्तरा के जीवन में कहीं ना कहीं एक सन्नाटा पसरा हुआ है |उत्तरा को ऐसा क्यों महसूस हो रहा है| क्या वह अपने अंदर चल रहे इन बातों को को समाज को दिखा पाती है पूरी कहानी जानने के लिए सुनते हैं मालती जोशी की लिखी कहानी सन्नाटा, पूजा श्रीवास्तव की आवाज में…
पुनर्विवाह का दूसरा नाम है समझौता । हर परिस्थिति से , हर हालात से समझौता करना ही पुनर्विवाह है। हालात से तो समझौता किया जा सकता है लेकिन प्यार में समझौता ? कभी नहीं । फिर ऐसा समझौता क्यों करना पड़ा ? क्या मजबूरी थी ?
अच्छा वक्त कब बदल जाए कोई नहीं बता सकता। दुल्हन बनने के सपने देखने वाली आँखों में कब आँसू भर जाए ? कब सपने चूर-चूर हो जाए ? कौन बता सकता है ? वक्त के आगे हम सब बेबस हैं ।वक्त की हर शह गुलाम है ।
लड़की शादी के बाद ससुराल जाते समय अपने साथ बहुत कुछ ले जाती है। उसके रंगीन सपने, उसकी उम्मीदें, उसके अरमान और उसकी इच्छाएँ। लेकिन सभी के सभी सपने, उम्मीदें, अरमान पूरे नहीं होते। कभी-कभी साथ जीना भी दुष्कर हो जाता है। तब आपसी समझौते से अलग होना ही बेहतर होता है। लेकिन क्या अलग होकर भी सब कुछ अलग हो जाता है ? शायद नही।
घर गृहस्थी की बातों को इतनी सहजता से कहने में पारंगत मालती जोशी की कहानियों में यह कहानी जिसमें गृहस्थी में संतुलन रखने के लिए छोटे-छोटे झूठ बोले जाते हैं जिससे गृहस्थी में शांति और संतुलन बना रहता है इसी बात को बेहद खूबसूरत ढंग के साथ प्रस्तुत किया है मालती जोशी ने अपनी कहानी खूबसूरत झूठ में
उर्वशी एक आधुनिक लड़की है जो होशियार होने के साथ ही जीवन में कुछ कर दिखाने की चाहत रखती है। प्रेम विवाह कर पति से उपेक्षित होने के बाद भी उसने हिम्मत न हारते हुए अपनी जिंदगी में कुछ कर दिखाने की चाहत को पूरा करने का प्रयास किया जिसमें उसकी खूबसूरती ही उसके लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई। उसकी जिंदगी एक कटी पतंग की तरह झूलने लगी।
अच्छा वक्त कब बदल जाए कोई नहीं बता सकता। दुल्हन बनने के सपने देखने वाली आँखों में कब आँसू भर जाए ? कब सपने चूर-चूर हो जाए ? कौन बता सकता है ? वक्त के आगे हम सब बेबस हैं ।वक्त की हर शह गुलाम है ।
गुलियाना का एक ख़त ….जिसके नाम का अर्थ है फूलों सी औरत ……पर वह लोहे के पैरों से लगातार दो साल चल कर युगोस्लाविया से चल कर अमृता तक आ पहुंची | गुलियाना की कहानी इस दुनिया के किसी भी देश की नारी की कहानी है। ये कहानी अमृता प्रीतम ने दशकों पहले लिखी थी लेकिन आज भी ख़त के वो सवाल वहीं खड़े हैं
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