कहानी जीवन की उस सत्यता से परिचय कराती है कि इंसान तभी अपनों की अहमियत का एहसास करता है, जब वह व्यक्ति उसके पास नहीं होता | कहानी में 62 वर्ष के राजीव निगम को जब सुबह यह पता चलता है कि उसकी पत्नी आरती रात में उसे और घर को छोड़कर कहीं चली गई है | तब राजीव निगम एहसास करता है कि आखिर 40 वर्ष साथ गुजारने के बाद, इस उम्र में आरती को यह कठोर फैसला क्यों लेना पड़ा होगा |धीरेंद्र अस्थाना की बेहद रोचक और दिल को छू लेने वाली कहानी है ‘पराधीन ‘,सुनते हैं नयनी दीक्षित की आवाज में…
कहानी “जो है उस धूसर सन्नाटे में “,धीरेंद्र अस्थाना जी ने बहुत ही सजीव ढंग से प्रस्तुत किया है कि आज की दुनिया में किसी भी तरह की संवेदना लोगों में नहीं बची है| खासतौर पर मीडिया, अखबार और किसी भी तरह के सोशल अकाउंट पर| आज की तारीख में किसी का जीना- मरना इस बात का मायने नहीं रखता कि वह इंसान इंपॉर्टेंट था या नहीं |लोग मरते हैं ,मर जाते हैं इस तरह की स्टेटमेंट हमें अक्सर सुनने को मिल जाते हैं |आज का समय जिसमें हम लोग जी रहे हैं, बहुत ही असंवेदनशील है | इस पूरे समाज में जो असंवेदनशील है ,उसमें एक ऐसा इंसान जो किसी एक की मृत्यु होने पर अपना खुद का व्यक्तित्व ही भूल जाता है इस बात पर आधारित है यह कहानी…
धीरेंद्र अस्थाना की कहानी चीख में, एक अबोध बालक के मन पर मारपीट का प्रभाव उसके जीवन को कहां तक उधर- पुथल के रास्ते पर ले जा सकता है ? इन बातों का प्रभाव एक छोटे से बच्चे के मन पर पड़ता है जो युवा होने के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ता और किस तरफ अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है | यह कहानी समाज के सामने एक प्रश्न रखती है कि क्या इस तरह की चीजों से निपटना सामाजिक दायित्व नहीं है?
कहानी का नायक हरीश अपने अतीत से मानसिक रूप से लड़ रहा है |वास्तव में हरीश का अतीत उसे वर्तमान में नहीं रहने दे रहा| क्या है पूरी कहानी जानने के लिए हैं सुनते हैं धीरेंद्र अस्थाना के द्वारा लिखी गई कहानी भूत,नयनी दीक्षित की आवाज में…
कहानी दुखम शरणम गच्छामि में, इस जिंदगी में उम्र के और समय के हर पड़ाव पर तरह-तरह के दो खाते हैं ,निर्भर करता है कि हम उन दुखों से आत्मसात कैसे करते हैं? दुखों से किस प्रकार सामना करते हैं?कहीं दुख प्रेम का होता है ,कहीं दुख कैरियर को लेकर होता है, कहीं दुख शारीरिक होता है ,कहीं दुख पर पारिवारिक होता है और मानसिक होता है| अपने सारे दुखों से भागकर आप संन्यास नहीं ले सकते| उन दुखों की शरण में जाना, उन्हें आत्मसात करना उन दुखों से डील करना ही मानव का धर्म है| उसी पर यह कहानी आधारित है
रक्त मंडल के पिछले भाग में आपने सुना कि गोपाल शंकर और मिस्टर केमिन किले पर धावा बोल चुके हैं। किस तरह नगेंद्र नरसिंह गोपाल शंकर को रोज़ के साथ तहखाने में कैद कर , गुब्बारे की सहायता से ऊपर चले गए ।क्या गोपाल शंकर और रोज़ की मौत हो गई ?गोपाल शंकर और मि. केमिन के द्वारा बनाई गई योज़ना सफल हो पाई । इसके आगे के भाग को सुनने के लिए सुनते हैं कहानी का यह हिस्सा
द्रौपदी रौद्र रूप धारण कर लेती है। उसके दुर्गा-जैसे तेजोद्दीप्त भयंकर रौद्र-रूप को देख दु:शासन घबरा जाता है और उसके वस्त्र खींचने में स्वयं को असमर्थ पाता है। द्रौपदी कौरवों को पुन: चीर-हरण करने के लिए ललकारती है। सभी सभासद द्रौपदी के सत्य, तेज और सतीत्व के आगे निस्तेज हो जाते
दुःशासन द्रौपदी के बाल खींचकर भरी सभा में ले आता है और उसे अपमानित करना चाहता है। तब द्रौपदी बड़े साहस एवं निर्भीकता के साथ दुःशासन को निर्लज्ज और पापी कहकर पुकारती है।द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी जी ने इस खंडकाव्य को जितने प्रभावी ढंग से वर्णन किया है ,उतने ही प्रभावी ढंग से नयनी दीक्षित ने आवाज दी है
ख़ौफ़नाक इमारत – Ibnesafi ( इब्नेसफी) – Nayani Dixit
क्या ऐसी कोई इमारत आपने देखी है जिसके अंदर बनी हुई सालों पुरानी कब्र से मुर्दा निकलकर लोगों का मर्डर कर दे? और आखिर वह मुर्दा ऐसा क्यों कर रहा है? क्या सचमुच उसके अंदर मुर्दा है या कहानी कुछ और ही है ?क्या इस सीरीज़ का जासूस इमरान इन लोगों का पता लगा पाएगा? कौन है यह मुर्दा? मुर्दा है या फिर कोई जिंदा व्यक्ति? कौन कातिल है और कौन शिकारी ? इब्रेसफ़ी की सस्पेंस और थ्रिलर से भरपूर कहानियों की सीरीज़ सुनिए ख़ौफ़नाक इमारत मे, नयनी दीक्षित की आवाज़ में…
हिमालय पर्वतारोहण संस्थान की स्थापना 4 नवंबर, 1954 में भारत में पर्वतारोहण को क्रीड़ा के रूप में बढ़ावा देने हेतु की गई थी|1953 में तेंज़िंग नाॅरगे और एडमंड हिलेरी द्वारा एवरेस्ट की चोटी पर पहला मानव कदम रखा गया|
भारतीय वायु सेना की स्थापना 8 अक्टूबर 1932 को हुई थी और पहली उड़ान 1 अप्रैल 1933 को भरी थी। भारतीय वायु सेना को आजादी से पहले ‘रॉयल इंडियन एयर फोर्स’ के नाम से जाना जाता था। आजादी के बाद 1950 में इसके नाम से रॉयल शब्द हटा दिया गया था। भारतीय वायु सेना ने 1933 में पहली बार उड़ान भरी थी।
मेला – ममता कालिया – शैफाली कपूर
कहानी में प्रयागराज में लगे कुंभ मेले का दृश्य है जहां दूर-दूर से लाखों की संख्या में लोग अपने पाप को धोने के लिए संगम में डुबकी लगाने आते हैं। क्या मात्र डुबकी लगाकर पाप से मुक्त हुआ जा सकता है ?क्या वास्तव में अध्यात्म को भी एक पेशे की दृष्टि से अपनाया जाता है? आस्था ,परंपरा इन सब बातों का अद्भुत संगम है इस कहानी में। इसी बात को रोचक ढंग से आधार बनाकर ममता कालिया ने कहानी मेला का ताना-बाना बुना है,जिसे शेफ़ाली कपूर ने उतने ही अनोखे अंदाज़ से अपनी आवाज़ से निखारा है।
एक सेवानिवृत्त व्यक्ति के दिनचर्या, उसकी सोच और उसके जीवन में आए बदलाव को आलोकित करती हुई यह गीत भावना तिवारी की आवाज में ….
सेवा – ममता कालिया – शैफाली कपूर
पुरुषोत्तम सहाय की पत्नी करीब 15 दिनों से अस्पताल में कोमा की स्थिति में पड़ी है। पुरुषोत्तम सहाय अकेले ही अपनी पत्नी की सेवा कर रहे हैं। कहने को पुरुषोत्तम सहाय की दो शादी-शुदा बेटियां, पुत्र, पुत्र-वधू ,पोता सभी है पर ऐसी स्थिति में अपनी उस मां के लिए जिसने ता-उम्र अपने पति और बच्चे की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया ,आज वही बच्चे क्या अस्पताल में जाकर मां की सेवा करना चाह भी रहें हैं या फिर मात्र औपचारिकता (formality) निभा रहे हैं ?ऐसी स्थिति में पुरुषोत्तम सहाय अपने बच्चों से क्या उम्मीद कर रहा है। पूरी कहानी जानने के लिए सुनते हैं ममता कालिया के द्वारा लिखी गई कहानी सेवा ,शेफाली कपूर की आवाज़ में
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