“रोम-रोम में बसते राम”
भगवान श्रीराम का नाम मात्र स्मरण भी मन को पवित्र कर देता है और जीवन को एक नई दिशा देता है।
उनकी महिमा, उनकी मर्यादा और उनके आदर्शों का यह भावपूर्ण काव्य-गान आपको भीतर तक स्पर्श करेगा।
🎧 सुनिए —
“रोम-रोम में बसते राम”
भावना तिवारी की सुमधुर आवाज़ में
कश्मीर की सुंदरता जहां एक ओर अपनी तरफ लोगों को आकर्षित कर रही है वहीं उसी कश्मीर में रह रहे लोगों ने कैसे खौफनाक मंजर का सामना किया है उसी व्यथा को भावना ने अपने गीत में बेहद मार्मिक ढंग से उड़ेला है…
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यह मधुर गीत उस स्थिति को दर्शाता है ,जब हम नए-नए प्रेम में पड़ते हैं | हमारा तन – मन हमारे काबू में नहीं होता | भावना तिवारी जी की मधुर आवाज में….
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जब कोई प्रेम में होता है,
तो उसके लिए
प्रेम के अलावा
और कुछ भी
महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाता।
हर सोच, हर एहसास
उसी एक व्यक्ति के
इर्द-गिर्द घूमने लगता है।
इसी सच्चे और गहरे अहसास को
बड़े सादेपन से
यह मधुर गीत सामने रखता है—
भावना तिवारी की आवाज़ में।
भावना तिवारी की आवाज़ में भाई बहन के भावों को प्रदर्शित करती रक्षा बंधन पर एक भाव पूर्ण कविता, जो आपकी आँख नाम कर देगी
निशा निमंत्रण से लिया गया यह गीत जिसमें शाम होने पर किस प्रकार वातावरण बदल जाता है बड़ी ही खूबसूरती के साथ उल्लेख किया गया है
गोपालदास नीरज की कविता संग्रह फिर फिर दीप जलेगा से ली गयी कविता मिट्टी वाले में कवि ने उन सभी पर कटाक्ष किया है जो मिट्टी का मोल लगाते ह़ै कवि का मानना है कोई भी इसका मोल नहीं लगा सकता। क्या इस मिट्टी का इतिहास इतना सस्ता है कि कुछ मोल चुका कर इसे कोई भी खरीद सकता है ?आज इसी मिट्टी के लिए हम युद्ध की स्थिति तक पहुंच जाते हैं, तो क्या ऐसी मिट्टी का कोई मोल हो सकता है ,वह तो अमूल्य है | कवि अपने स्पष्ट शब्दों में समझाना चाह रहा है कि यह मिट्टी अपना मोल नहीं चाहती बल्कि सिर्फ मिट्टी अपनी कुर्बानी चाहती है| कविता के माध्यम से इसका पूर्ण भाव को समझते हैं, भावना तिवारी की आवाज में…
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यह मधुर गीत उस स्थिति को दर्शाता है ,जब हम नए-नए प्रेम में पड़ते हैं | हमारा तन – मन हमारे काबू में नहीं होता | भावना तिवारी जी की मधुर आवाज में….
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क्या गलत है, क्या सही |बिना जाने -समझे किसी भी बात की रूपरेखा खींच लेना कितना उचित है ?क्या यह उचित नहीं होगा कि जब तक हम किसी भी बात को पूर्ण रूप से ना समझ ले, तब तक किसी भी बात पर अपना निर्णय नहीं बनाना चाहिए | इसी बात को उजागर करती हुई अनुपम ध्यानी की आवाज में कविता जानकर चलो मान कर नहीं..
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