बंशी रखकर साकी क्षणभर बेगम के पास आकर खडी हुई। उसका शरीर काँपा, ऑंखें जलने लगी, कंठ सूख गया। वह घुटने के बल बैठकर बहुत धीरे-धीरे अपने आंचल से बेगम के मुख का पसीना पोंछने लगी। इसके बाद उसने झुककर बेगम का मुँह चूम लिया। बादशाह जब शिकार से लौटते हैं ,तो अपनी बेगम को बेसुध देखकर बहुत क्रोधित होते हैं |बेगम सलीमा इस बात से अनभिज्ञ होती है ,उसके समीप रहने वाली साकी एक पुरुष है |बादशाह को जब यह ज्ञात होता है तो इसका जिम्मेदार बेगम सलीमा को समझते हैं | बेगम सलीमा बिना किसी खता होने पर भी अपने को इस बात का जिम्मेदार समझते हुए मृत्यु को अपना लेती है | क्या होता है? जब बादशाह को इस बात का पता चलता है कि इस पूरे प्रकरण में उनकी बेगम सलीमा का कोई दोष नहीं था | जानने के लिए सुनते हैं आचार्य चतुरसेन शास्त्री के द्वारा लिखी गई नामालूम सी एक खता ,अमित तिवारी जी की आवाज में…
युवती: तो तुमने आखिर क्या फैसला किया?
ज्ञान सिंह: मैं इस कड़े को नहीं निकाल पाऊंगा और आखिर मैं ऐसा क्यों करूं?
युवती: मैं तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी कर दूंगी।
ज्ञान सिंह: तुम मुझे दे ही क्या सकती हो?
आखिर वह खूबसूरत युवती कौन है जो ज्ञान सिंह से उसके गुरु का दिया हुआ कड़ा मांग रही है? एक रात ज्ञान सिंह के साथ कौन सी हैरतअंगेज घटना हुई? ज्ञान सिंह के साथ आखिर क्या हुआ? सुनिए सस्पेंस से भरी हुई एक रोमांचक कहानी “नागिन का इश्क”, शैफ़ाली कपूर की आवाज़ में।
एक कोठरी में एक अस्थि-पंजर के रूप में दिख रही हालत में एक स्त्री अपने सूखे हुए स्तनों से अपने गोद में लिए हुए 8 माह का बालक को स्तनपान करा रही है उसी के बगल में उसी की एक आठ वर्ष का बालक बैठा हुआ वह भी भूख से बिलख रहा है है आज से 5 माह पूर्व इस परिवार की यह दयनीय स्थिति नहीं थी |ऐसा क्या हुआ कि आज स्त्री इतनी विचलित अवस्था में है ? पूरी कहानी जानने के लिए सुनते हैं आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा लिखी गई कहानी फंदा ,सुमन वैद्य की आवाज में
युवती: तो तुमने आखिर क्या फैसला किया?
ज्ञान सिंह: मैं इस कड़े को नहीं निकाल पाऊंगा और आखिर मैं ऐसा क्यों करूं?
युवती: मैं तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी कर दूंगी।
ज्ञान सिंह: तुम मुझे दे ही क्या सकती हो?
आखिर वह खूबसूरत युवती कौन है जो ज्ञान सिंह से उसके गुरु का दिया हुआ कड़ा मांग रही है? एक रात ज्ञान सिंह के साथ कौन सी हैरतअंगेज घटना हुई? ज्ञान सिंह के साथ आखिर क्या हुआ? सुनिए सस्पेंस से भरी हुई एक रोमांचक कहानी “नागिन का इश्क”, शैफ़ाली कपूर की आवाज़ में।
पति -पत्नी के बीच में शक की भावना उनके वैवाहिक जीवन को नष्ट कर सकती है |ऐसा ही कुछ सलीमा के साथ होता है सलीमा बादशाह का बेसब्री से इंतजार कर रही है| इंतजार की घड़ियां नहीं कट पाती तो मैं अपनी बाँदी बीन भीम सुनाने का आदेश देती है | बाँदी स्त्री के भेष में एक पुरुष होता है बादशाह इस दृश्य को देखकर सलीमा पर आरोप लगाता है |कहानी में आगे क्या होता है क्या सलीमा इस आरोप को सहन कर पाती है? क्या होता है बादशाह के साथ? पूरी कहानी जानने के लिए सुनते हैं दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी ,सुमन वैद्य की आवाज में
एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर का बेटा अंसार मात्र 21 वर्ष की आयु में भारत का सबसे युवा आईएएस ऑफिसर कैसे बना? इस अविश्वसनीय सी लगने वाली कहानी को सुनिए अमित तिवारी की आवाज़ में…
दिन भर कवि शहर की तमाम गलियों में इधर से उधर चक्कर लगाता रहा; किंतु किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। उसने कभी किसी की खुशामद नहीं की थी और न किसी भद्रलोक का स्वागत गान ही बनाया था। न तो उसने किसी राजा की प्रशंसा में कोई कविता की थी और न किसी बाबू साहब के विवाहोत्सव में कोई छंद पढ़ा था। फिर उसे पूछता ही कौन?
आसिफ़ अहमद की फ़र्श से अर्श तक की कहानी, बचपन से आर्थिक तंगी से गुज़रने वाले आसिफ़ अहमद का बड़ा बनने का जुनून ,उनका आत्मविश्वास और अपने सपनों की डोर को हमेशा थामें रखने का हुनर उन्हें एक मामूली से बिरयानी का ठेला लगाने वाले शख़्स से आज 70 करोड़ टर्न ओवर के मालिक होने की पहचान दिला रहा है। यह सब कैसे हुआ? आसिफ़ अहमद की आम आदमी से ख़ास आदमी बनने की क्या रही कहानी ?इसे जानते हैं अमित तिवारी के द्वारा
काकी कहा करती थीं कि लोग मर जाते हैं लेकिन वास्तव में वे मरते नहीं हैं। बस चोला बदल जाता है। तुम्हारे काका भी मरे नहीं हैं। यहां उनका समय पूरा हो गया था, दाना पानी उठ गया था, इसलिए चले गये। हमें भी साथ ही जाना था, लेकिन हमारा टिकट कहीं खो गया है। दूत लोग ढूंढ रहे होंगे। मिलेगा तैसे ही हमें भी जाना है। ये हां इंतजार कर रहे होंगे। तुम्हारे काका हमसे कहे थे कि हम चल रहे हैं तुम आना। एक वृद्धा है जिसे सब काफी कहते हैं अपने पति की मृत्यु के बाद उसका जीवन कैसा हो जाता है किस प्रकार अपने पति की यादों को सहेज कर रखना चाहती है कृष्णकांत जी के द्वारा लिखी गई कहानी काकी में सुनते हैं अमित तिवारी जी की आवाज
आप खुद सोचिये कि अगर सरकार के विचार में हिन्दी कहीं पर रुकी पड़ी है तो उसे आगे बढ़ाने की ही बात होगी न। इस देश में किसी को आगे बढ़ाने की बात सरकार ही तो करती है? हिन्दी के मामले में तो सरकार केवल बात ही नहीं कर रही बल्कि अगर ध्यान दें तो सरकार ने इन साठ सालों में हिन्दी को धक्के लगा-लगा कर इंच-इंच आगे बढ़ाने की कोशिश में क्या-क्या नहीं किया।हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है किंतु आधुनिक समय में हिंदी के प्रयोग के लिए भी लोगों को प्रोत्साहित करने की जरूरत पड़ रही है इसी बात पर व्यंग करते हुए कमलेश पांडे जी की कहानी प्रोत्साहित होती हिंदी अमित तिवारी जी की आवाज में
उर्वशी एक आधुनिक लड़की है जो होशियार होने के साथ ही जीवन में कुछ कर दिखाने की चाहत रखती है। प्रेम विवाह कर पति से उपेक्षित होने के बाद भी उसने हिम्मत न हारते हुए अपनी जिंदगी में कुछ कर दिखाने की चाहत को पूरा करने का प्रयास किया जिसमें उसकी खूबसूरती ही उसके लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई। उसकी जिंदगी एक कटी पतंग की तरह झूलने लगी।
कहानी मैं एक स्कूल जाने वाला लड़का जब अपनी बहन के साथ गुड़िया की शादी का खेल खेलता है, तो उसके अध्यापक और सहपाठी उसका मजाक उड़ाते हैं और उसे ‘दुल्हन ‘कह कर बुलाते हैं| क्या होता है पूरी कहानी में ?जानने के लिए सुनते हैं रविंद्र नाथ ठाकुर के द्वारा लिखी गई कहानी दुल्हन “,शिवानी आनंद की आवाज में
लेखक और उसकी पत्नी के बीच उनकी नीरस भरी जिंदगी को लेकर तनाव होता है| लेखक इस घटना से अपने आप को तुलसीदास के चरित्र से जोड़कर देख कर रहे हैं |
कहानी बेहद भावपूर्ण है एक लेखक निशिकांत अपने दोस्त रमेश के पास जाता है जो एक अनाथालय चला रहा है | बंगाल से आई एक प्यारी सी मासूम अनाथ लड़की मीनू से उसकी मुलाकात होती है |निशिकांत के जीवन में मीनू की क्या भूमिका रहती है और क्या है मीनू का अतीत? विष्णु प्रभाकर की कहानी मुक्ति में जानते हैं नयनी दीक्षित की आवाज में…
रोजी मेरे पिताजी के राजकुमार विद्यार्थी द्वारा दी गई एक कुत्ती थी। एक रोज जब हम आम की डाल पर झूल – झूल कर अपने संग्रहालय का निरीक्षण कर रहे थे, तब हमने देखा कि रोजी़ मुँह में किसी जीव को दबाए हुए ऊपर आ रही है। आकार में वह गिलहरी से बढ़ा न था पर आकृति में स्पष्ट अंतर था। रामा उसे रुई की बत्ती से दूध पिलाता। कुछ ही दिनों में वह स्वस्थ और पुष्ट होकर हमारा साथी हो गया। बाबू जी से यह सुनकर कि हमारे लिए टट्टू आया है , हम उससे रुष्ट और अप्रसन्न ही घूमते रहे पर अंत में उसने हमारी मित्रता प्राप्त कर ही ली। नाम रखा गया रानी। फिर हमारी घुड़सवारी का कार्यक्रम आरंभ हुआ। एक छुट्टी के दिन दोपहर में सबके सो जाने पर हम रानी को खोलकर बाहर ले आए। मेरे बैठ जाने पर भाई ने अपने हाथ की पतली संटी उसके पैरों में मार दी। इससे ना जाने उसका स्वाभिमान आहत हो गया या कोई दुखद स्म्रति उभर आयी । वह ऐसे वेग से भागी मानो सड़क पर नदी- नाले सब उसे पकड़कर बाँध रखने का संकल्प किए हो। कुछ दूर मैंने अपने आप को उस उड़न खटोले पर सँभाला परंतु गिरना तो निश्चित था !
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