गुरु नानक देव जी की 500 जयंती के अवसर पर अमृतसर में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की स्थापना की गई।यह पंजाब राज्य विधानमंडल द्वारा पारित एक अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया था। विश्वविद्यालय को यूजीसी द्वारा “उत्कृष्टता की क्षमता वाले विश्वविद्यालय” का दर्जा भी दिया गया है।
मंगलयान मंगलवार के दिन दोपहर भारतीय समय 2:38 अपराह्न पर श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) के सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र से ध्रुवीय प्रक्षेपण यान पीएसएलवी सी-25 द्वारा प्रक्षेपित किया गया।
लीला सेठ का जन्म लखनऊ, उत्तर प्रदेश में 20 अक्टूबर, 1930 को हुआ। लीला सेठ बचपन में ही पिता की मृत्यु के बाद विधवा मां के सहारे पली-बड़ीं और मुश्किलों का सामना करते हुए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जैसे पद तक पहुंचने का सफर पूरा किया
27 नवंबर 1895 को अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी आखिरी वसीयत लिखी थी। इसी वसीयत के आधार पर नोबेल पुरस्कारों की स्थापना हुई। 1901 में पहली बार नोबेल पुरस्कार दिए गए। अब तक 975 शख्सियत और संस्थानों को 609 नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं।
27 सितंबर 1980 में संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन (UNWTO) ने विश्व पर्यटन दिवस की शुरुआत विश्व समुदाय को संस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों के प्रति जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से की।
संयुक्त राष्ट्र ने 16 अक्टूबर 1945 को विश्व खाद्य दिवस मनाने की शुरुआत की. संयुक्त राष्ट्र ने 16 अक्टूबर 1945 को रोम में “खाद्य एवं कृषि संगठन” की स्थापना की. उसके बाद “कॉन्फ्रेंस ऑफ द फ़ूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाईजेशन” ने साल 1979 से विश्व खाद्य दिवस मनाने की घोषणा की
मात्र 19 वर्ष की आयु में इंग्लिश चैनल पार करने वाली हिंदुस्तान की जलपरी के नाम से मशहूर आरती साहा ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया ।इस कीर्तिमान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया।
धीरेंद्र अस्थाना की कहानी मुहिम में, समाज में जो निर्धन और धनी के बीच बीच में जो भेदभाव है| उसी के चलते एक बालक मन ना चाहते हुए भी किस तरह जाने -अनजाने में गलत रास्ते पर, क्राइम की राह पर चल पड़ता है?किस तरह उसके मन में क्राइम को सच समझ लेने की मुहिम पैदा हो जाती है
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भारत की महान क्रांतिकारी में से एक मातंगिनी हाजरा को ‘बूढ़ी गांधी’ के नाम से के नाम से जाना जाता है।’कर बंदी’ आंदोलन को दबाने के लिए बंगाल में इन्होंने जोरदार प्रदर्शन किया। हजारों लोगों के साथ सरकारी डाक बंगले पर पहुंचकर इन्होंने अपना जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। 72 वर्ष की आयु में इन्हें अंग्रेजों ने गोलियों से छलनी कर दिया किन्तु मरते दम तक तिरंगे को इन्होंने गिरने नहीं दिया। आखिरी समय में भी उनके मुंह से वंदे मातरम ही निकलता रहा।
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