जिस अवकाश के समय को लोग आमोद प्रमोद के लिए सुरक्षित रखते हैं उसी को मैं इस खंडहर और उसके क्षत-विक्षत चरणों पर पछाड़े खाती हुई भागीरथी के तट पर सुख से काट देती हूँ। कब और कैसे मुझे उन बालकों को कुछ सिखाने का ध्यान आया मैं नहीं जानती। मेरे विद्यार्थी पीपल की छाया में मेरे चारों ओर एकत्र हो गए। वह गोधूलि मुझे अब तक ना भूली जब एक मलिन स्त्री ने मुझे कुछ शब्दों और कुछ संकेतों से कहा कि उसके अकेले लड़के को भी और बच्चों के साथ बैठने दिया करूँ। तो यह कुछ तो सीख सकें । वह घीसा था जिसकी सचेत आँखों में ना जाने कौन सी जिज्ञासा भरी थी । जब उन लोगों को मुझे छोड़ जाना था तब मेरा मन बहुत ही अधीर हो उठा। मैं घीसा को ढूँढ रही थी । हार कर मैं चली किंतु अंधेरे में एक काला धब्बा आता दिखा। वह घीसा था। उसके दोनों हाथों में एक बड़ा तरबूज था ।घीसा के पास न पैसा था ना खेत। तब क्या वह इसे चुरा लाया है? मन का संदेह बाहर आया। तब पता चला कि घीसा आज नया कुर्ता दे आया और उसके बदले में मेरे लिए तरबूज लाया है। किंतु चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गर्मी में वह कुर्ता पहनता ही नहीं।
गाय के नेत्रों में हिरन के नेत्रों-जैसा विस्मय न होकर आत्मीय विश्वास रहता है। उस पशु को मनुष्य से यातना ही नहीं, निर्मम मृत्यु तक प्राप्त होती है, परंतु उसकी आंखों के विश्वास का स्थान न विस्मय ले पाता है, न आतंक। महादेवी वर्मा जी के द्वारा लिखित प्रसिद्ध कहानियों में से है कहानी गौरा गाय |महादेवी जी के स्नेह पाकर गौरा गाय हष्ट-पुष्ट हो गई थी, किंतु एक समय ऐसा भी आया गौरा अपने बछड़े को छोड़कर सदा के लिए चल बसी |आखिर क्या हुआ था गौरा के साथ ?जानते हैं नयनी दीक्षित की आवाज में कहानी गौरा गाय….
किसी सजातीय -विजातीय जीव से मेल ना रखने के कारण माली ने उस खरगोश का नाम लड़ाकू रखा। मेरी शिष्याओ ने उसके कट खन्ने स्वभाव के कारण उसे दुर्मुख पुकारना आरंभ किया , और मैंने दुर्वासा की संज्ञा से विभूषित किया । उसका मिलना भी एक दुर्योग ही कहा जाएगा । पड़ोस के दंपति ने खरगोश का एक जोड़ा पाल रखा था। एक रात मार्जारी ने दोनों खरगोश और उनके तीन बच्चों को क्षत-विक्षत कर डाला। केवल एक शशक- शिशु जीवित बचा, जिसे हमारा माली मेरे घर ले आया। मैं उसके अकेलेपन को दूर करने के लिए एक शशक- वधू खरीद लाई। किंतु दुर्मुख ने उसे स्वीकार नहीं किया , परंतु कुछ महीनों के अंतराल में उसकी कलहप्रियता में कुछ अंतर दिखाई पड़ा।
उस दिन मैं बिना कुछ सोचे हुए ही भाई निराला जी से पूछ बैठी थी,” आपके किसी ने राखी नहीं बांधी?” ” कौन बहन हम जैसे भुक्कड़ को भाई बनावेगी?” मे, उत्तर देने वाले के एकांकी जीवन की व्यथा थी, या चुनौती ? यह कहना कठिन है ।पर जान पड़ता है किसी अन्य चुनौती के आभास ने ही मुझे उस हाथ के अभिषेक की प्रेरणा दी। उनके अस्त-व्यस्त जीवन को व्यवस्थित करने के असफल प्रयास का स्मरण कर मुझे आज भी हंसी आ जाती है। संयोग से उन्हें कहीं से ₹300 मिले। उन्होंने मुझे अपने खर्च का बजट बनाने का आदेश दिया। अस्तु : नमक से लेकर नापित तक और चप्पल से लेकर मकान के किराए तक का अनुमान- पत्र मैंने बनाया। उन्हें पसंद आया ।पर दूसरे ही दिन वह सवेरे आ पहुँचे। ₹50 चाहिए किसी विद्यार्थी की परीक्षा शुल्क भरना है वरना—–
पश्चिम में रंगो का उत्सव देखते देखते जैसे ही मुँह फेरा कि नौकर सामने आ खड़ा हुआ, कि एक वृद्ध मुझसे मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मेरी कविता की पहली पंक्ति ही लिखी गई थी । मैं खिसिया गई ।कुछ खींझी सी उठी। कण्व ऋषि जैसे सफेद बाल और दूधफेनी जैसी सफेद दाढ़ी वाला मुख । मैंने कहा कि आपको पहचानती नहीं ? तो उन्होंने उत्तर दिया कि जिस के द्वार पर आया है उसका नाम जानता है, इससे अधिक माँगने वाले का परिचय क्या होगा? मेरी पोती आपसे मिलने के लिए विकल है । मैं आश्चर्य से वृद्ध की ओर देखती रह गई।
आजादी के पावन पर्व पर जब पूरी नगरी सज रही थी । तब कोठों पर भी रंग बिरंगी झालर सजाई जा रही थी। शम्मो जान का कोठा भी जगमगा रहा था ।मुन्नी बाई ने शम्मोजान से पूछा कि यह आजादी का जश्न आज क्यों हो रहा है? हम तो कब के आजाद हो चुके हैं! है ना ! तो क्या वास्तव में आजादी सभी को मिल सकी है ? क्या वास्तव में मुन्नी जान जैसी कितनी ही मुन्नीजान आजाद है ?
शादी एक जुआ है।सही दाव लग गया तो पौ बारह, लेकिन अगर दाव उल्टा पड़ गया तो जिंदगी जहन्नुम बन जाती है।इस फ़न में हर कोई माहिर नही होता।वो विरले ही होते है जो इस फ़न में माहिर होते हैं ।
भाभी ब्याह कर आई थी तो मुश्किल से 15 बरस की होगी। आजाद फिजा में पली, हिरिनयों की तरह कुलाचें भरती। चार-पाँच साल के अंदर भाभी को घिस घिसाकर वाकई सब ने ग्रहस्थन बना दिया। दो -तीन बच्चों की माँ बन कर भद्दी और ठुस्स हो गई। भैया को मेकअप ,फैशनेबल कपड़े, कटे बालों से नफरत थी ।भाभी ने भी बनना- सँवरना छोड़ दिया। लेकिन फैशनेबल शबनम को देखकर भैया मंत्रमुग्ध हो गए और भाभी को तलाक देकर उसे अपनी बेगम बना लिया। कुछ ही सालों में शबनम भी वैसे ही फैल गई। भैया एक बार फिर मिस्री रक्कासा पर फिदा हो गए दूसरी नई- नवेली लचकती हुई लहर, उनकी पथरीली बाँहों में समाने के लिए बेचैन और बेकरार थी।
चीनी फेरीवाला फाटक से बाहर आता दिखाई दिया । उसके कंधे पर भूरे कपड़े का गट्ठर था। मैंने कहा कि मैं फॉरेन नहीं खरीदती, तो सरल विस्मय के साथ उसने कहा कि हम क्या फारन है ? हम तो चाइना से आता है । मैंने अपनी नहीं को और अधिक कोमल बनाकर कहा, मुझे कुछ नहीं चाहिए भाई । चीनी भी विचित्र निकला,’ हमको भाई बोला है ।तुम जरूर लेगा। बहुत अच्छा सिल्क आता है सिस्तर। और उस दिन से उसे मेरे घर में आने जाने की परवानगी मिल गई
रेवती एक आधुनिक युग की लड़की है जिसे रूढ़िवादी विचार न तो पसंद हैं और न ही वह उन्हें अपना सकती है। वह हर कदम पर समाज से लड़ते हुए अंत में अपने बॉस प्रशांत से विवाह का निर्णय लेती है जोकि उसकी बिरादरी का नही है।
आकांक्षा – गाय दी मोपासां – नयनी दीक्षित
प्रसिद्ध फ्रेंच लेखक guy de Maupassant के द्वारा लिखी गई कहानी आकांक्षा में ,एक ऐसे किरदार की कहानी है जो बाल्यावस्था से ही प्रतिष्ठित, सम्मानित व्यक्ति बनने की आकांक्षा रखता है किंतु कहते हैं ना कि कभी-कभी यह आकांक्षा अति आकांक्षा में तब्दील हो जाती है। ऐसे ही कुछ इस किरदार के साथ होता है। यह किरदार इस बात से इतना अधिक ग्रसित हो जाता है या यूं कहें अंधा हो जाता है कि उसके घर में ही, उसकी नाक के नीचे कोई सुराग हो रहा है, उसके परिवार में कोई सेंध लगाई जा रही है, उसे पता ही नहीं चलता। ऐसे में उस किरदार के साथ और क्या- क्या घटित होता है। जानिए कुछ गंभीर ,कुछ व्यंग कुछ भावविभोर कर देने वाली यह खूबसूरत कहानी आकांक्षा में जिसे आवाज़ दी है नयनी दीक्षित ने…
बिन्नी और टीनू की गर्मियों की छुट्टियां हो गई है और दोनों अपने दादा जी के यहां गए हुए हैं| अब दादा जी के यहां मस्ती भरे दिन बिताने के बाद क्या बिन्नी और टीनू को वापस लौटने का मन करेगा? पूरी कहानी जाने के लिए सुनते हैं संजीव ठाकुर के द्वारा लिखी गई कहानी हमें नहीं जाना, निधि मिश्रा की आवाज में
बदरूनिसा.. जैसा रूप यौवन,उससे भी मीठा गला। पहले पहल उसका संगीत ही खींच ले गया था । फिर उसके रूप ने मोहपाश में ऐसा बंधा की दो दिन अपनी बदरू से ना मिलते जो जैसे साँस ही ना आती थी । उनकी जान थी वो फिर भी थी तो वो एक गाने वाली। वक़्त के साथ एक नामी परिवार के वारिस होने की ज़िम्मेदारी में उनकी बदरु कहीं पीछे छूट गयी । और फिर सालो बाद आया उसका वो पैग़ाम … “ एक बार मिल लीजिए , आपको आपकी अमानत सौपनी है “ क्या थी वो अमानत ? सेठ जी को अपनी पूरी साख मिट्टी में मिलती दिख रही थी । क्या सेठ जी बदरु से मिलने गए। क्या वो जान सके की किस अमानत की बात कर रही थी बदरूनिस्सा, और अब Iक्यों ? एक बेहतरीन कहानी शिवानी जी की लेखनी से … “कौन “
गर्मी की चिलचिलाती धूप और दूर-दूर तक सपाट सूखी धरती ।पानी का नामोनिशान नहीं।यहाँ वीरान खंडहरों में कुछ नंग-धडंग बच्चे और अम्माएँ। निपट अकेली, बिना किसी सहारे के कैसे रह रही हैं ?ना तन ढकने के लिए कपड़े और ना घर का कोई आदमी !
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Nana Lal
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