उन तमाम टुकड़े-टुकड़े घटनाओं को एक दिन कहानी में पिरोकर ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में दे दिया तो तुम जैसे बौखला गये थे। यहाँ तक लिखा तुमने कि तुम्हारी इन नितान्त अन्तरंग बातों के साथ यह सब क्यों किया मैंने, और करने ही चला तो क्यों वसुधा के बारे में सारी बातें सच-सच नहीं लिखीं-वह तो इससे हज़ार गुना उदार थी ! यह कहानी वसुधा और देवेंद्र की है जो एक टाइप इंस्टिट्यूट में एक साथ होते हैं वसुधा के जीवन की कहानी एक सप्ताहिक पत्रिका में छपती है जिसे पढ़कर लोगों में अपनी जीवन की छाया मिलती
नेहा ओम बाबू और निरूपा की बेटी है ओम बाबू हद से ज्यादा अपनी बेटी नेहा से प्रेम करते हैं रघु नेहा को स्कूल के दिनों से प्रेम करता है नेहा की खातिर कुछ भी करने को हमेशा तैयार रहता है इधर नेहा की दोस्ती अर्जुन और फिर रघुवीर से हो जाती है परंतु अचानक से एक दिन कोई दोनों के सिर पर वार कर उन्हें घायल कर देता है नेहा को इस बात की शंका है कि यह काम रघु के द्वारा किया गया है क्या नेहा की शंका सत्य है या इसके पीछे कोई और कारण है प्रेम और सस्पेंस से भरी इस मनोरंज क जुनैद के द्वारा लिखी गई कहानी फितूर को सुनते हैं अमित तिवारी जी की आवाज म
दिन भर कवि शहर की तमाम गलियों में इधर से उधर चक्कर लगाता रहा; किंतु किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। उसने कभी किसी की खुशामद नहीं की थी और न किसी भद्रलोक का स्वागत गान ही बनाया था। न तो उसने किसी राजा की प्रशंसा में कोई कविता की थी और न किसी बाबू साहब के विवाहोत्सव में कोई छंद पढ़ा था। फिर उसे पूछता ही कौन?
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है यह कहानी इस बात का एहसास दिला जाती है जिसे जिंदगी में हम बंधन समझते हैं दर असल में वही हमारे जीने की मुख्य वजह होती है दिनकर वाडेकर के द्वारा लिखी गई कहानी अकेलेपन का एहसास अमित तिवारी जी की आवाज में
सुमित एक सीधा साधा मेधावी छात्र है जो दिव्या से प्यार करता है| किंतु दिव्या उसके प्यार को अस्वीकार कर देती है| इस बात से सुमित काफी हताश हो जाता है |अमजद, सुमित का दोस्त है जो उसे इस मुश्किल से निकालने में मदद करता है |आज सुमित एक रानीपुर का एस.पी है और दिव्या उसके पास पुनः लौटना चाहती है किंतु दोस्ती और प्यार में सुमित किसको चुनता है पूरी कहानी जानने के लिए सुनते हैं जुनैद की लिखी कहानी दोस्ती, अमित तिवारी की आवाज में
लोग ना जाने क्या-क्या बातें करते हैं आलसी लोगों के लिए… किंतु गुलाब राय जी ने आलस्य को जीवन का एक अहम हिस्सा बताया है और ऐसे- ऐसे तर्क दिए हैं जो वाकई इस धारणा को गलत साबित कर देंगे जो आलस्य को बुरा मानते हैं ।जानना नहीं चाहेंगे वह कैसे? आलस्य पर व्यंग कसते हुए गुलाब राय जी ने आलस्य को अपनाने और उसकी उपयोगिता पर खूबसूरत ढंग से अपनी बात रखी है उनके इस वक्तव्य को सुनते हैं अमित तिवारी जी की आवाज़ में..
कहानी में प्रेम की पराकाष्ठा झलकती है| एक युवक जिसका नाम बलवंत है अर्बुद-गिरि राज्य की राजकुमारी को अपलक दृष्टि से देखता रहता है और प्रेम करता है| युवक को राजमहल लाया जाता है तो महारानी उसके आगे एक कठोर शर्त रखती हैं| क्या है वह युवक के लिए शर्त ? कौन है वह युवक ? क्या युवक शर्त को पूर्ण कर राजकुमारी से विवाह कर पाता है?क्या होता है इसको जानने के लिए सुनते हैं जयशंकर प्रसाद के द्वारा लिखी गई कहानी रसिया बालम, निधि मिश्रा की आवाज में
दर्पण – ममता कालिया – शैफाली कपूर
कितने ही वर्तमान के अरमानों को कुचल कर ,इंसान भविष्य की इमारत बनाने की इच्छा तो रखता है किंतु क्या यह सच नहीं है कि जब भविष्य में जब उन इच्छाओं के पूरा होने का क्षण आता है तब तक उस इच्छा का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। ऐसा ही कुछ हो रहा है नायिका बानी के साथ। बानी जब तक मां-बाप के साथ थी तो उनके कड़े अनुशासन के कारण अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं का दमन करना पड़ता था ।आज जब बानी शादीशुदा है तो पति के नियमों के चलते उसे फिर अपनी इच्छाओं पर मौन का चोला पहनाना पड़ रहा है। इतने वर्षों के बाद जब उसकी छोटी-छोटी इच्छाओं का सम्मान किया जा रहा है तो वह क्यों उत्साह विहीन हो चुकी है ?बेहद भावुक कर देने वाली ममता कालिया की कहानी है दर्पण, जिसे आवाज़ दी है शैफ़ाली कपूर ने…
कहानी के मुख्य पात्र निशिकांत के मन की उस दशा को चित्रित किया गया है जहां पर वह स्वयं शादीशुदा होकर भी किसी दूसरी स्त्री के रूप ,सौंदर्य की तरफ आकर्षित है किंतु जब वह अपनी पत्नी को इस रूप में सोचता है कि जैसे वह किसी पराई स्त्री के प्रति आकर्षित है वैसे कोई और भी उसकी पत्नी के प्रति भी आकर्षित हो सकता है |तो क्या वह इसे स्वीकार कर पाएगा| निशिकांत की इस बंद को मन के द्वंद को समझते हैं विष्णु प्रभाकर के द्वारा लिखी गई कहानी निशिकांत नयनी दिक्षित की आवाज में
जब तक बातें होती रहतीं, उन्हें लगता कि वे एक चलती-फिरती, जीती-जागती दुनिया से जुड़े हुए हैं, वरना इस शहर के अनजाने चेहरों के समुद्र में एक भी पहचाना चेहरा उन्हें नजर नहीं आता था। तब उनकी मनःस्थिति एक भटके हुए जहाज की हो जाती। कहाँ जाएँ… क्या करें… सब कुछ अपरिचित… अटूट एकाकीपन| विधुर रविंद्र बाबू अपने बेटे- बहू के पास आए हुए | बेटा और बहू दोनों नौकरी- पेशा है |घर में सारी सुविधाएं होने के बावजूद एकाकीपन परेशान कर रहा है एकाकीपन से बचने के लिए यहां -वहां लोगों से अपना परिचय बढ़ा रहे हैं किंतु क्या यह उनका प्रयास उनका एकाकीपन दूर कर पाता है? क्या होता है आगे रविंद्र बाबू जी की जिंदगी में ?जानने के लिए सुनते हैंअंजना वर्मा जी के द्वारा लिखी गई कहानी यहाँ-वहाँ हर कहीं,पूजा श्रीवास्तव जी की आवाज में…
शुरु से तो वह जानती थी कि यह जो छोटा सा अनाकर्षक मगर भला सा चेहरा है, वह सच नहीं एक घुटा हुआ साईकियाट्रिस्ट है, उसे पता है, विवाहित महिलाओं की ग्रंथियां, मन की जरूरतें।कहानी की नायिका 45 वर्ष की शादीशुदा महिला है |उसकी दोस्ती एक पुरुष साईकियाट्रिस्ट से हो जाती है | किंतु अब नायिका को को महसूस हो रहा है कहीं ना कहीं मन में एक खेद का रेशा अटका पड़ा है, नायिका ऐसा क्यों सोच रही है क्या है इसके पीछे की कहानी| जानने के लिए सुनते हैं मनीषा कुलश्रेष्ठ के द्वारा लिखी गई कहानी खेद का रेशा अटका, पूजा श्रीवास्तव की आवाज में
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