ब्रिटेन की नागरिक होने के बावजूद एनी बेसेंट का भारत के प्रति विशेष लगाव रहा। उनका लक्ष्य हिंदू समाज में आई कुरीतियों को दूर करना रहा। भारत को उन्होंने अपनी मातृभूमि और कर्मभूमि की तरह पूजा। मदन मोहन मालवीय के साथ मिलकर उन्होंने हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हर साल 29 अक्तूबर को विश्व स्ट्रोक दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने की शुरुआत साल 2004 में हुई, जब कनाडा में वर्ल्ड स्ट्रोक कांग्रेस ने इस दिन को मनाया। दो साल बाद वर्ष 2006 में इस दिन को जन जागरूकता के लिए घोषित किया गया। 2006 में, वर्ल्ड स्ट्रोक फेडरेशन और इंटरनेशनल स्ट्रोक सोसाइटी के विलय के साथ वर्ल्ड स्ट्रोक संगठन स्थापित हुआ। तब से, विश्व स्ट्रोक संगठन (डब्ल्यूएसओ) विभिन्न प्लेटफार्मों पर विश्व स्ट्रोक दिवस (डब्ल्यूएसडी) मनाता आ रहा है।
पांडुरंग शास्त्री एक दार्शनिक, आध्यात्मिक नेता, समाज सुधारक के रूप में जाने वाले एक जाना- माना नाम है। उनके द्वारा स्वाध्याय आंदोलन और स्वाध्याय परिवार की स्थापना की गई ।श्री भगवतगीता पर आधारित आत्मज्ञान आंदोलन उनमें से एक है। उनके जन्म दिवस को ‘मनुष्य गौरव दिन’ के रूप में मनाया जाता है 1999 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
भारत की महान क्रांतिकारी में से एक मातंगिनी हाजरा को ‘बूढ़ी गांधी’ के नाम से के नाम से जाना जाता है।’कर बंदी’ आंदोलन को दबाने के लिए बंगाल में इन्होंने जोरदार प्रदर्शन किया। हजारों लोगों के साथ सरकारी डाक बंगले पर पहुंचकर इन्होंने अपना जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। 72 वर्ष की आयु में इन्हें अंग्रेजों ने गोलियों से छलनी कर दिया किन्तु मरते दम तक तिरंगे को इन्होंने गिरने नहीं दिया। आखिरी समय में भी उनके मुंह से वंदे मातरम ही निकलता रहा।
चितरंजन दास का जन्म 05 नवम्बर 1870 ई. को ढाका के विक्रमपुर में हुआ था। वे कोलकाता उच्च न्यायालय के प्रसिद्ध वकील थे, जो 1909 ई. में अलीपुर बम कांड में अरविंदो घोष का बचाव कर चर्चित हो गए ।
हृदय रोगों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 29 सितंबर 2012 को WHF ने WHO के साथ मिलकर विश्व हृदय दिवस की घोषणा की।
कहानी एक शरारती बंदर की है, जिसे अपनी शरारत का परिणाम भुगतना पड़ता है |कैसे? पंचतंत्र की कहानियों में से एक कहानी बंदर और लकड़ी का खूंटा, सुनते हैं शिवानी आनंद की आवाज में…
द्रौपदी ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका है |वह केवल दु:शासन ही नहीं वरन् अपने पति को भी प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर स्पष्टीकरण माँगती है। वह भरी सभा में यह सिद्ध कर देती है कि जुए में स्वयं को हारने वाले युधिष्ठिर को मुझे दाँव पर लगाने का कोई अधिकार नहीं है
अमृता प्रीतम की लिखी हुई इस नज़्म “दुआ ” में ऐसा क्यों महसूस होता है की कोई दुआ कबूल हो या ना हो लेकिन इस नज़्म में मांगी गई दुआ को जरूर कबूल होना चाहिए |आखिर क्या है वह दुआ उसे जानने के लिए सुनते हैं अनुर्वी कीआवाज में अमृता प्रीतम की लिखी हुई नज़्म “दुआ “में”…
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