धरोहर आठवीं शब्दांजलि कालजयी रचनाकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कविवर पं़ गोविन्द प्रसाद तिवारी जी की रचनाएं और स्मृतियाँ सुनिये उनके पुत्र श्री अभय तिवारी जी के साथ।
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये कल सुनते हैं श्री राजेश राज जी को। शिवोहम साहित्यिक मंच अपनी गीत यात्रा में अनेक लब्ध प्रतिष्ठित गीतकारों को आपके मध्य ला चुका है और आप सबके सहयोग और उत्साहवर्धन से यह यात्रा अनवरत जारी है। इस तरह के आयजनों का उद्देश्य मात्र मनोरंजन नहीं है बल्कि यह है कि जो आक्षेप हिंदी मंच पर लगते रहे कि कविता समाप्त हो गयी या मृतप्राय है उन सबका पटाक्षेप करना है क्योंकि हिंदी के पास आज भी वो तमाम साधक है जो सतत अपनी साहित्य साधना में लगे हुए हैं और माँ हिंदी के कोष में वृद्धि कर रहे हैं। श्री राजेश राज जी भी उन रचनाकारों में से हैं जिन्होंने सदैव ही साहित्य में सृजन करते समय उत्कृष्टता को प्राथमिकता दी। उन्होंने अपने मानक स्वयं निर्धारित किए और साहित्यिक जगत की नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय रास्ता भी बनाया। आइये उनके गीतों की रचनात्मकता, उनके कला कौशल और उनकी विलक्षण भाव प्रवणता को सुनें
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में कल सुनिये पूर्णिमा वर्मन जी को। हिंदी कविता सहित्य विधा है जिसका दरवाज़ा महिलाओं नें समय समय पर खटखटाया भी है और अधिकारपूर्वक उसमे दाखिल भी हुई हैं। कहीं माँ मीरा नें अपने मोहन को पुकारा तो उनके शब्द माधुर्य के आगे बड़े बड़े तपस्वियों का तप फीका पड़ गया। कहीं श्रद्धेया महादेवी की अपनी पीड़ा गीतों में मुखर होकर हमारे सामने आई तो पूरे संसार को रुला गयी। कहीं आदरेया सुभद्राकुमारी चौहान में अंग्रेजों को झांसी की रानी के स्वर में ललकारा तो पूरा हिंदुस्तान उनके स्वर में स्वर मिला उठा। श्रृंखला में अनगिन नाम हैं जो लिखें जाएं तो समय और स्याही दोनों का अभाव हो जाएगा। उसी श्रंखला में समकालीन अनेक नाम हैं जिन्होंने साहित्य जगत में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज भी कराई वरन स्वयं को नाम से लेकर हस्ताक्षर तक स्थापित भी किया। ऐसे ही एक नाम आदरणीया पूर्णिमा वर्मन जी से हम मिलेंगे कल शिवोहम साहित्यिक मंच के फेसबुक पेज पर जिनके गीत उनको हिंदी की कवयित्रियों में विशेष स्थान दिलाते हैं। उनके गीतों का स्त्री विमर्श, उनके गीतों की श्रंगारिकता, शब्द चयन, विषय वैविध्य सब कुछ अद्भुत है। वे श्रोताओं के साथ साथ पाठकों की भी प्रिय हैं।
धरोहर सत्रहवीं शब्दांजलि यशशेष कवि निर्दोष हिसारी की रचनाएँ और संस्मरण सुनिए उनकी सुपुत्री कवयित्री अल्पना सुहासिनी जी साथ
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में कल सुनिये प्रसिद्ध गीतकार श्री यश मालवीय जी को। मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् ।। (रामायण, बालकाण्ड, द्वितीय सर्ग, श्लोक १५) कहा जाता है कि यह श्लोक रामायण का आधारभूत श्लोक है जो सदैव से यह परिभाषित करता रहा है कि कविता का उद्भव करुणा से हुआ है। वास्तव में कविता मात्र करुणा का नहीं वरन हमारे जीवन के अनेकानेक अनुभवों का रूपांतर है। एक प्रेमी विरह में प्रेमिका का स्मरण कर गीत रच सकता है तो वही वही प्रेमी मिलन के क्षणों में नायिका की वेणी में पुष्प गूँथते हुए भी काव्यपथ की ओर चल सकता है। माँ मीरा अपने पदों में अपने आराध्य को याद कर लेती है तो बाबा सूर अपने सखा को बुला लेते हैं। कहीं महीयसी महादेवी की पीड़ा बिलखती है तो कहीं बाबा नागार्जुन का रोष व्यंग करता है, कहीं भूषण के छंद गर्जन करते हैं तो कहीं काका के कुंडलिया अट्टहास करते से दिखाई देते हैं। हमारे जीवन के हर अनुभव को कविता नें देखा है, लिखा है और गाया है। गीतों के अनंत मार्ग के एक ऐसे ही पथिक से हम मिलते हैं जिन्हें हम श्री यश मालवीय के नाम से जानते हैं। वे उन चुनिंदा रचनाकारों में से हैं कि वे जिस राह पर चल रहे थे उसी राह पर मील के पत्थरों में उनके नाम को अंकित कर दिया गया है। उनके विषय में बहुत कुछ भी कह दिया जाए तो कहीं किसी को अतिशयोक्ति का भान नहीं होगा ऐसे गीत पथ के अग्रगामी पथिक, गीत कविता के अनन्य पुरोधा के अमृतमय गीतों के श्रवण लाभ का आनंद लें
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये कल सुनते हैं प्रसिद्ध गीतकार श्री विनोद श्रीवास्तव जी को। श्री विनोद श्रीवास्तव जी वर्तमान के उन गीतकारों में से हैं जिनके लिए उनकी कविता की सार्थकता सर्वोपरि है। आज के समय में जब ऐसी कविताओं की बाढ़ आ गयी जिनकी उम्र सप्ताह दो सप्ताह से अधिक नहीं होती तब उनके जैसा गीतकार सच्चे गीतों की रचनाओं में पूर्णतः समर्पित है। उनके गीतों के विम्ब विधान, शब्द योजना और प्रतीक विन्यास पाठकों को सहज ही आश्चर्यचकित कर देते हैं। उनके भाव पक्ष में आशातीत कल्पनाशक्ति का अद्भुत समन्वय मिलता है। कभी कभी तो उनके गीत पढ़कर लगता है मानों वे और गीत एक दूसरे के पर्याय हैं।
बैसवारा उत्तर प्रदेश की वह भूमि जिसने भारत के इतिहास में कलम और तलवार दोनों से अपना विशेष स्थान बनाया है। मंचीय कविता के लोग कहते हैं कि अगर बैसवारे के श्रोताओं ने आपको मन से सुन लिया तो आप पूरे हिंदुस्तान में कहीं भी बहुत अच्छे से सुने जाएंगे। महाप्राण निराला जी, सुमन जी, आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी जी, सनेही जी जैसे अद्भुत साहित्यकारों को अपने अंक में बिठाने वाली इस वसुंधरा के एक अप्रतिम गीतकार से हम परिचय करेंगे #शिवोहम_साहित्यिक_मंच के #धरोहर की द्वितीय शब्दान्जलि में। स्मृतिशेष शिव बहादुर सिंह भदौरिया जी नवगीत के अति विशिष्ट रचनाकर हुए हैं। नवगीत दशक से लेकर नवगीत का कोई भी वृहद समवेत संकलन आपकी उपस्थिति के बिना पूर्ण नहीं माना जाता। उनके गीत ग्राम्यांचल की मिट्टी से लेकर महानगर की अधुनिकता तक को अपने मे समेट कर चलते हैं।
धरोहर नवीं शब्दांजलि यशशेष गीतकार देवल आशीष जी की रचनाएं और स्मृतियाँ सुनिये उनके शिष्य श्री धीरज मिश्र जी और समीक्षक मुनेन्द्र कुमार शुक्ल जी के साथ।
शिवोहम सहित्यिक मंच धरोहर की प्रथम शब्दांजलि कालजयी रचनाकार डॉ उर्मिलेश शंखधर जी की कविताएं और स्मृतियाँ सुनिये उनकी पुत्री श्रीमती सोनरूपा विशाल जी के साथ।
धरोहर सत्रहवीं शब्दांजलि यशशेष कवि निर्दोष हिसारी की रचनाएँ और संस्मरण सुनिए उनकी सुपुत्री कवयित्री अल्पना सुहासिनी जी साथ
धरोहर श्रृंखला बाइसवीं और अन्तिम शब्दांजलि कीर्तिशेष गीतकार आत्म प्रकाश शुक्ल जी की रचनाएँ और संस्मरण सुनिए लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार श्रद्धेय डॉ. शिवओम अम्बर जी के साथ
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