सप्तम सर्ग – कर्ण – बलिदान
यह रश्मिरथी खण्डकाव्य का अंतिम सर्ग है। कर्ण और अर्जुन का दुर्धर्ष युद्ध चरम पर है। एक बार तो कर्ण के बाणों से आहत हो अर्जुन मूर्छित तक हो जाते हैं। परंतु काल के वश कर्ण के रथ का पहिया कीचड़ में फंसता है और उसी क्षण श्रीकृष्ण अर्जुन को ललकारते हैं
खड़ा है देखता क्या मौन भोले?
शरासन तान, बस अवसर यही है।
घड़ी फिर और मिलने की नहीं है,
विशिख कोई गले के पार कर दे।
अभी ही शत्रु का संहार कर दे।
और अर्जुन का एक बाण महापराक्रमी योद्धा को सदैव के लिए काल के हवाले कर देता है। श्रीकृष्ण सभी को सीख देते हैं कि कर्ण का चरित्र निश्चय ही अनुकरणीय है।
समझ कर द्रोण मन में भक्ति भरिये,
पितामह की तरह सम्मान करिये।
मनुजता का नया नेता उठा है।
जगत से ज्योति का जेता उठा है।
मोहाना रियासत के महाराज की बीमारी भी उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रसिद्ध हो गई थी | देश -विदेश के ना जाने कितने प्रतिष्ठित डॉक्टरों ने महाराज के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन बीमारी ऐसी, जिसका उपचार करने में सभी असफल हुए | अब ऐसे में मुंबई मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर संघटिया ने ऐसा क्या कर दिया कि महाराज स्वस्थ हो गए ?व्यंग से भरपूर रोचक यशपाल के द्वारा लिखी गई रोचक कहानी महाराजा का बीमारी, सुनते हैं नयनी दीक्षित की आवाज में….
Maa Brahmacharini
शारदीय नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा का दिन होता है। बता दें कि ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां का ये रूप अपने भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। शास्त्रों में ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानि तप का आचरण करने वाली बताया गया है। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं।
Chants credit- Jyoti upreti sati
भीष्म पितामह द्रौपदी द्वारा उठाए गए प्रश्नों को सर्वथा उचित मानते हैं किंतु साथ में यह कहते हैं कि धर्मराज युधिष्ठिर धर्म से बंधे हुए हैं अतः इस कारण उन्हें अपनी हार स्वीकार करनी होगी |पत्नी ,पति की अर्धांगिनी होती है इस नाते उनका तुम्हारे ऊपर अधिकार बनता है|
कुएँ का राज – Ibnesafi ( इब्नेसफी) – Nayani Dixit
200 साल पुरानी एक रहस्यमयी कोठी…
उसके भीतर छिपा एक वीरान कुआँ…
और ऐसा राज़, जिसे आज तक वहाँ रहने वाले लोग भी नहीं समझ पाए।
आख़िर उस कुएँ में ऐसा क्या है, जिसकी गुत्थी सुलझाने के लिए इंस्पेक्टर फ़रीदी को बुलाना पड़ा?
घर के भीतर गूंजती जानवरों की डरावनी चीखें…
हर रोज़ होती रहस्यमयी मौतें…
और फिर… एक इंसान की हत्या।
कुएँ के अंदर मिलती लाशें…
क्या यह किसी भूत का साया है?
या फिर किसी बेहद ख़तरनाक साज़िश का हिस्सा?
अगर आप भी इस रहस्य के पीछे छिपी सच्चाई जानना चाहते हैं, तो सुनिए इब्ने सफ़ी द्वारा लिखी गई रोमांच और सस्पेंस से भरपूर कहानी श्रृंखला —
“कुएँ का राज़”
नयनी दीक्षित की दमदार आवाज़ में… सिर्फ़ Gaatha App पर।
फरीदी और लियोनार्ड – Ibnesafi ( इब्नेसफी) – Nayani Dixit
इब्ने सफ़ी की कहानी फ़रीदी और लियोनार्ड में लियोनार्ड एक बेहद चलाक लेकिन बेहद घटिया किस्म का ब्लैकमेलर है ।जो ब्लैक मेलिंग तक ही नहीं रुकता बल्कि क़त्ल और दूसरे और हथकंडे अपनाने पर भी उतर आता है। कहानी में लियोनार्ड कौन-कौन से हथकंडे आज़माता हैं?फ़रीदी किस प्रकार उसको अपनी गिरफ्त में लेता है ?इस बेहद सनसनीख़ेज़ कहानी को आवाज़ दी है नयनी दीक्षित ने..
द्वितीय सर्ग में उच्चकुलाभिमानी राजवंश की उपेक्षा के दंश से ग्रसित कर्ण धनुर्विद्या सीखने के लिए महर्षि परशुराम की शरण में जाते हैं। परंतु वहाँ वह अपने सूत पुत्र होने की पहचान छिपा लेते हैं। सारी विद्याएं सीखने के उपरांत एक दिवस काल का कराल चक्र चलता है और कर्ण की पहचान से पटाक्षेप हो जाता है तब महर्षि परशुराम कर्ण को श्राप देते हैं
सिखलाया ब्रह्मास्त्र तुझे जो काम नहीं वह आएगा।
है यह मेरा श्राप समय पर उसे भूल तू जाएगा।।
पांचवां सर्ग – मातृ विनय
पंचम सर्ग में कुंती स्वयं कर्ण के पास जाकर अपना मातृत्व प्रदर्शित करने का प्रयास करती हैं। वह कर्ण से आग्रह करती हैं कि कर्ण पाण्डवों के विपक्ष में होकर अपने ही सगे भाइयों के विरुद्ध शस्त्र संधान न करे।
इस पर कर्ण पाण्डव पक्ष में सम्मिलित होने से तो मना कर देता है परंतु कुंती को इस वचन से साथ विदा करता है कि समय आने पर वह अर्जुन के सिवा किसी पाण्डव को नहीं मारेगा। इस प्रकार कुंती के पुत्रों की संख्या पाँच ही बनी रही रहेगी। और इसी तरह कुंती खाली हाथ वहाँ से वापस चल देती हैं।
हो रहा मौन राधेय चरण को छूकर,
दो बिंदु अश्रु के गिरे दृगों से चूकर।
बेटे का मस्तक सूँघ बड़े ही दुख से,
कुंती लौटी कुछ कहे बिना ही मुख से।
छठे सर्ग की कथावस्तु हमे युद्धभूमि की ओर ले जाती है जहाँ अब कर्ण कौरव सेना का सेनापति है। श्रीकृष्ण को ज्ञात है कि जब तक कारण के पास देवराज इंद्र द्वारा प्रदत्त एकघ्नी शक्ति है तब तक पाण्डवों की विजय का मार्ग प्रशस्त नहीं है। अतः वह महावीर भीम पुत्र घटोत्कच को रण में आहूत करते हैं। उसके आते ही कौरव सेना में हाहाकार मच जाता है। तब दुर्योधन कर्ण से निवेदन करते हैं
दाहक प्रचंड इसका बल है,
यह मनुज नहीं कालनल है।
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तू नहीं जोश में आएगा,
आज ही समर चूक जाएगा।
अंततः कर्ण सेनापति के धर्म का निर्वाह करते हुए अमोघ एकघ्नी शक्ति का संधान करते हैं और घटोत्कच वीरगति को प्राप्त होता है। दिवस निश्चय ही कौरवों के नाम होता है पर कर्ण को ज्ञात है कि भविष्य अब पाण्डवों का हो चुका है।
हारी हुई पाण्डव चमू में हँस रहे भगवान थे।
पर जीत कर भी कर्ण के हारे हुए से प्राण थे।
चतुर्थ सर्ग – महादान
चतुर्थ सर्ग में देवराज इंद्र ब्राह्मण वेश में प्रातः काल सूर्योपासना के समय कर्ण के पास आते हैं और कर्ण से कवच और कुंडल दान में मांगते हैं। संकल्पबद्ध कर्ण उन्हें अपने कवच और कुंडल दान करते हैं। कर्ण के व्रत को देख देवराज इंद्र कर्ण को महादानी, पवित्र और सुधि जबकि अपने आप को प्रवंचक, कुटिल और पापी जैसी संज्ञाएँ देते हैं। ग्लानि में आकंठ डूबे देवराज इन्द्र कर्ण को एकघ्नी शक्ति वरदान में प्रदान करते हैं।
‘दानवीर! जय हो, महिमा का गान सभी जन गाये,
देव और नर, दोनों ही, तेरा चरित्र अपनाये.’
दे अमोघ शर-दान सिधारे देवराज अम्बर को,
व्रत का अंतिम मूल्य चुका कर गया कर्ण निज घर को।
प्रथम सर्ग – शौर्य प्रदर्शन
रश्मिरथी का प्रथम सर्ग आरम्भ होता है कौरव और पाण्डव राजकुमारों के शक्ति प्रदर्शन से। रंगभूमि में सभी कुमारों के शौर्य को देखकर जनता दंग हो जाती है। तब अचानक आगे आकर कर्ण सभी कुमारों को ललकारते हैं। इस पर उनका कुल – गोत्र जब सभा पूछती है तो वे उत्तर देते हैं
पूछो मेरी जाति शक्ति हो तो मेरे भुजबल से।
रवि समान दीपित ललाट से और कवच कुंडल से।
वाद विवाद के बाद एक तरफ कर्ण को दुर्योधन अंगदेश का राजा बनाते हैं वहीं गुरुवर द्रोण को यह भान हो जाता है कि अर्जुन का मार्ग अब निष्कंटक नहीं रहा।
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pragati sharma