प्रथम सर्ग – शौर्य प्रदर्शन
रश्मिरथी का प्रथम सर्ग आरम्भ होता है कौरव और पाण्डव राजकुमारों के शक्ति प्रदर्शन से। रंगभूमि में सभी कुमारों के शौर्य को देखकर जनता दंग हो जाती है। तब अचानक आगे आकर कर्ण सभी कुमारों को ललकारते हैं। इस पर उनका कुल – गोत्र जब सभा पूछती है तो वे उत्तर देते हैं
पूछो मेरी जाति शक्ति हो तो मेरे भुजबल से।
रवि समान दीपित ललाट से और कवच कुंडल से।
वाद विवाद के बाद एक तरफ कर्ण को दुर्योधन अंगदेश का राजा बनाते हैं वहीं गुरुवर द्रोण को यह भान हो जाता है कि अर्जुन का मार्ग अब निष्कंटक नहीं रहा।
होली का नाम सुनते ही मन में कृष्ण और राधा की लीलाएं उभर आती हैं। इसी भाव को जब मीराबाई ने अपने भजन में व्यक्त किया है तो उसमें चार -चांद और लग जाते हैं। किस तरह मीराबाई ने कृष्ण की होली का बखान किया है ?आइए सुनते हैं…https://gaathaonair.comwp-content/uploads/2021/03/Hori-khelat-hain-girdhari-by-meerabai..wav
जीवन में फैशन, पैसे की प्रति एक-दूसरे से होड़ , पाश्चात्य संस्कृति को हमेशा फॉलो करते रहना जैसी कई बातें बहुत शीघ्रता से हावी हो जाती है |हर सिक्के के 2 पहलू होते हैं कहीं कुछ कम, तो कहीं कुछ ज्यादा| तो उसी तरीके से मीडिया एक इतनी खतरनाक चीज है कि जिसमें आज की तारीख में कोई संस्कृति और सभ्यता कोई समाज के प्रति लगाव जैसी चीज नहीं रह गई हैं | मीडिया नाम की संस्था वही लोग चला रहे हैं जिनके पास सिर्फ दंगा भड़काऊ बातें हैं, इन बातों से समाज में क्या प्रभाव पड़ेगा इस बात से बेफिक्र होकर समाज को किस गर्त में पहुंचा रहे हैं ? जानिए इन बातों को कहानी जो मारे जाएंगे में…
कभी -कभी दूसरे की खुशियां इंसान खुद जब महसूस करता है, तब वह जान पाता है कि अपने अंदर की खाली गुफा से या अपने अंदर के खालीपन से वह कैसे बाहर आ सकता है ? जब इंसान अपने स्टैंडर्ड को बहुत बहुत ही ऊंचा समझने लगता है और उसे लगता है कि उसके साथ तालमेल बैठाने के लिए दूसरे इंसान को उस तक पहुंचना होगा |तो कभी-कभी अपने दंभ से बहुत अकेला पड़ जाता है | इस कहानी का महेंद्र अपने दिल की इस खाली गुफा से कैसे बाहर निकलता है?
रामनाथ एक क्रांतिकारी है | रामनाथ में पूरा जीवन भारत माता के लिए समर्पित कर दिया| जिसके चलते आप 30 वर्षों के बाद वह जेल से निकल पाया है |जेल से निकलने के पश्चात निशिकांत और उसकी पत्नी के पास पहुंचा है दोनों दंपत्ति रामनाथ का बेहद स्नेह के साथ ख्याल रख रहे हैं किंतु फिर भी रामनाथ उनके पास नहीं रहना चाहता आखिर क्यों विष्णु प्रभाकर की कहानी क्रांतिकारी जानते हैं नयनी दीक्षित की आवाज में
रेलयात्रा – गाय दी मोपासां – नयनी दीक्षित
एक जवान स्त्री पुरुष का संबंध क्या केवल स्त्री पुरुष के संबंध को ही दर्शाता है या फिर एक जवान स्त्री पुरुष जो लगभग एक ही उम्र के हैं वह अनजाने में मां -बेटे के संबंध में भी बदल सकते हैं। रेल यात्रा कहानी सोसाइटी के स्त्री -पुरुष के संबंध को देखने के नजरिये को चोट करती हुई कहानी है। guy de maupassant द्वारा लिखी कहानी रेल यात्रा में जानिए नयनी दीक्षित की आवाज़ में..
चतुर्थ सर्ग – महादान
चतुर्थ सर्ग में देवराज इंद्र ब्राह्मण वेश में प्रातः काल सूर्योपासना के समय कर्ण के पास आते हैं और कर्ण से कवच और कुंडल दान में मांगते हैं। संकल्पबद्ध कर्ण उन्हें अपने कवच और कुंडल दान करते हैं। कर्ण के व्रत को देख देवराज इंद्र कर्ण को महादानी, पवित्र और सुधि जबकि अपने आप को प्रवंचक, कुटिल और पापी जैसी संज्ञाएँ देते हैं। ग्लानि में आकंठ डूबे देवराज इन्द्र कर्ण को एकघ्नी शक्ति वरदान में प्रदान करते हैं।
‘दानवीर! जय हो, महिमा का गान सभी जन गाये,
देव और नर, दोनों ही, तेरा चरित्र अपनाये.’
दे अमोघ शर-दान सिधारे देवराज अम्बर को,
व्रत का अंतिम मूल्य चुका कर गया कर्ण निज घर को।
छठे सर्ग की कथावस्तु हमे युद्धभूमि की ओर ले जाती है जहाँ अब कर्ण कौरव सेना का सेनापति है। श्रीकृष्ण को ज्ञात है कि जब तक कारण के पास देवराज इंद्र द्वारा प्रदत्त एकघ्नी शक्ति है तब तक पाण्डवों की विजय का मार्ग प्रशस्त नहीं है। अतः वह महावीर भीम पुत्र घटोत्कच को रण में आहूत करते हैं। उसके आते ही कौरव सेना में हाहाकार मच जाता है। तब दुर्योधन कर्ण से निवेदन करते हैं
दाहक प्रचंड इसका बल है,
यह मनुज नहीं कालनल है।
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तू नहीं जोश में आएगा,
आज ही समर चूक जाएगा।
अंततः कर्ण सेनापति के धर्म का निर्वाह करते हुए अमोघ एकघ्नी शक्ति का संधान करते हैं और घटोत्कच वीरगति को प्राप्त होता है। दिवस निश्चय ही कौरवों के नाम होता है पर कर्ण को ज्ञात है कि भविष्य अब पाण्डवों का हो चुका है।
हारी हुई पाण्डव चमू में हँस रहे भगवान थे।
पर जीत कर भी कर्ण के हारे हुए से प्राण थे।
द्वितीय सर्ग में उच्चकुलाभिमानी राजवंश की उपेक्षा के दंश से ग्रसित कर्ण धनुर्विद्या सीखने के लिए महर्षि परशुराम की शरण में जाते हैं। परंतु वहाँ वह अपने सूत पुत्र होने की पहचान छिपा लेते हैं। सारी विद्याएं सीखने के उपरांत एक दिवस काल का कराल चक्र चलता है और कर्ण की पहचान से पटाक्षेप हो जाता है तब महर्षि परशुराम कर्ण को श्राप देते हैं
सिखलाया ब्रह्मास्त्र तुझे जो काम नहीं वह आएगा।
है यह मेरा श्राप समय पर उसे भूल तू जाएगा।।
पांचवां सर्ग – मातृ विनय
पंचम सर्ग में कुंती स्वयं कर्ण के पास जाकर अपना मातृत्व प्रदर्शित करने का प्रयास करती हैं। वह कर्ण से आग्रह करती हैं कि कर्ण पाण्डवों के विपक्ष में होकर अपने ही सगे भाइयों के विरुद्ध शस्त्र संधान न करे।
इस पर कर्ण पाण्डव पक्ष में सम्मिलित होने से तो मना कर देता है परंतु कुंती को इस वचन से साथ विदा करता है कि समय आने पर वह अर्जुन के सिवा किसी पाण्डव को नहीं मारेगा। इस प्रकार कुंती के पुत्रों की संख्या पाँच ही बनी रही रहेगी। और इसी तरह कुंती खाली हाथ वहाँ से वापस चल देती हैं।
हो रहा मौन राधेय चरण को छूकर,
दो बिंदु अश्रु के गिरे दृगों से चूकर।
बेटे का मस्तक सूँघ बड़े ही दुख से,
कुंती लौटी कुछ कहे बिना ही मुख से।
तृतीय सर्ग – कृष्ण संदेश
रश्मिरथी के सभी सर्गो में यह सर्ग सर्वाधिक लोकप्रिय सर्ग है। संभावित युद्धजनित महाविनाश को टालने के लिए स्वयं योगिराज कृष्ण कौरवों के दरबार पहुंचते हैं और पांडव पक्ष की ओर से निवेदन करते हैं
दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खाएंगे,
परिजन पर असि न उठाएंगे।
परंतु हठी दुर्योधन को यह भी स्वीकार नहीं होता। वह तो केवल एक ही हठ पर अडिग था कि “सूच्याग्रं नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव।” और अभिमान वश वह श्रीकृष्ण को बंधक बनाने का असफल प्रयास भी करता है। अंत में श्रीकृष्ण यह भी प्रयास करते हैं कि कर्ण पाण्डव पक्ष में सम्मिलित हो जाये क्योंकि वह पांडवों का बड़ा भाई है, परंतु इस प्रयास में भी असफल हो उन्हें रिक्त – कर वापस आना पड़ता है।
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