शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये कल सुनते हैं श्री राजेन्द्र गौतम जी को। कल खगोल विज्ञान के अनुसार सूर्य ग्रहण है। अर्थात कल सूर्य पृथ्वी पर दिखाई नहीं देगा क्योंकि सूर्य और पृथ्वी के मध्य चंद्रमा आ जायेगा। परंतु यह आंशिक है। ग्रहण एक स्वाभाविक क्रिया है। भारतीय साहित्य भी ऐसे साहित्यिक ग्रहणों के कई काल से गुजरा है। तमाम असाहित्यिक राहुओं और केतुओं नें साहित्य के दैदीप्यमान सूर्य को निगलने का प्रयास किया है परंतु उस काल में कई साहित्यकार सूर्य की उन बचकर निकलने वाली रश्मियों की भाँति खड़े हो गए जो हमें यह आभास दिलाती रहीं हैं कि समय कठिन है पर उम्मीद नहीं छोड़ी जानी चाहिए। श्री राजेन्द्र जी उन उम्मीद की किरणों में से एक हैं। समय कैसा भी हो, गैर साहित्यिकता नें कितना भी मजबूती से पैर जमाये रहे हों आप सदैव साहित्यिक मार्ग पर अनवरत चलते रहे। आइये साहित्य मार्ग के दृढ़ अनुगामी से मिलें
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये कल सुनते हैं डॉ कुँवर बेचैन जी को। वर्तमान की मंचीय काव्य परंपरा में अग्रणी, सुमधुर प्रस्तोता डॉ कुंवर बेचैन जी वास्तव में गीतकुंवर हैं। उनके गीतों का वैविध्य, और प्रतीक योजना तो अद्भुत है ही साथ में उनका स्वर उसमें और अधिक सौंदर्य वृद्धि कर देता है। वे गीतों के साथ लोकरंजन व लोकमंगल दोनों की कार्य सम्पादित करने में सक्षम हैं। आइये हिंदी गीतिकाव्य के अलंकारिक स्वर को सुनें
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये आज सुनते हैं वरिष्ठ गीतकार श्री माहेश्वर तिवारी जी को। श्री माहेश्वर तिवारी जी हिंदी गीतकाव्य परम्परा के उन गीतकारों में से हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन गीतों को समर्पित किया। उनके गीतों को पढ़कर, उनकी शैली से प्रेरणा ले न जाने कितने कवि तैयार हुए। आप गीत को मंत्र की भाँति मारक बनाने में निष्णात हैं। आपके नवगीतों का प्रकृति चित्रण इतना सजीव है कि जैसे प्रकृति स्वयं देह धारण होकर वार्तालाप कर रही हो। मंचों पर गीत धारा को निष्कलुष, और जीवंत रखने में आपका योगदान अतुलनीय है।
शिवोहम_साहित्यिक_मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये कल सुनें कानपुर नगर से वरिष्ठ गीतकार श्री हरीलाल मिलन जी को। कानपुर सदैव से साहित्यिक गतिविधियों में उर्वर रहा है। अन्य शहरों के इतर कानपुर की एक अपनी विशेषता है कि कानपुर में अनेक साहित्यिक संस्थाओं के माध्यम से होने वाली कवि गोष्ठियों में आपको ऐसे रचनाकार मिल जाएंगे जिन्हें मंच पर आप दीपक लेकर भी खोजें तो शायद नहीं मिलेंगे। अनेक ऐसे नाम आज भी कानपुर में हैं जिन्हें मंच का कोई लालच नहीं, कोई लिप्सा नहीं परंतु उनकी साहित्य साधना अति उत्कृष्ट है। वे बिना प्रशंसा की आस में सतत अपने सहित्यिक पथ पर गतिमान हैं। श्री हरीलाल मिलन जी कानपुर की साहित्यिक खेप की धरोहर हैं। वे निरंतर अपनी साहित्य साधना के जाज्वल्यमान सूर्य से शब्दों की उर्वरा धरती को जीवन रश्मि प्रदान करते रहे हैं। वे अनेक कालजयी रचनाओं के रचनाकार हैं। उनका राष्ट्रभाषा गान पूरे हिंदुस्तान नें एक स्वर में अनेक रेडियो स्टेशनों के माध्यम से गुनगुनाया है।
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये आज सुनते हैं श्री बलराम श्रीवास्तव जी को। पिछले बीस वर्षों में हिंदी कविता के मंचों नें तमाम बदलाव देखे हैं। मंचों की शालीनता और गंभीरता का दुशाला धीरे – धीरे उतारा गया और एक समय ऐसा भी लगा जब लगा कि अब मंच से साहित्य रूपी चादर के खींचकर फेंक ही दिया जाएगा, उस कठिन समय में भी कई रचनाकार ऐसे रहे जिन्होंने अपने मूल्यों से समझौता कभी नहीं किया और श्री बलराम श्रीवास्तव जी उनमें से एक हैं। आदरणीय बलराम जी को सुनकर वह सभी सीख सकते हैं जिन्हें यह लगता है कि कविता की गंभीरता समाप्त करके ही आप मंचों की ऊंचाइयों को छू सकते हैं। आपके गीत साहित्यिक रूप से समृद्ध तो हैं ही साथ में आपका अद्भुत स्वर आपके गीतों को सम्मोहक स्वरूप प्रदान कर देता हैं। आपके गीतों का सस्वर पाठ ऐसा लगता है मानों किसी ने कानों में मिश्री घोल दी हो आपके गीतों की गंगा में आचमन कर मन पवित्र हो उठता है। बात चाहे श्रृंगार की हो , दर्शन की हो अथवा देशभक्ति की आपके गीतों नें हर पहलू को बड़े सलीके से छुआ भी है और उत्कृष्टता के सोपान तक पहुँचाया भी है।
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में कल सुनिये पूर्णिमा वर्मन जी को। हिंदी कविता सहित्य विधा है जिसका दरवाज़ा महिलाओं नें समय समय पर खटखटाया भी है और अधिकारपूर्वक उसमे दाखिल भी हुई हैं। कहीं माँ मीरा नें अपने मोहन को पुकारा तो उनके शब्द माधुर्य के आगे बड़े बड़े तपस्वियों का तप फीका पड़ गया। कहीं श्रद्धेया महादेवी की अपनी पीड़ा गीतों में मुखर होकर हमारे सामने आई तो पूरे संसार को रुला गयी। कहीं आदरेया सुभद्राकुमारी चौहान में अंग्रेजों को झांसी की रानी के स्वर में ललकारा तो पूरा हिंदुस्तान उनके स्वर में स्वर मिला उठा। श्रृंखला में अनगिन नाम हैं जो लिखें जाएं तो समय और स्याही दोनों का अभाव हो जाएगा। उसी श्रंखला में समकालीन अनेक नाम हैं जिन्होंने साहित्य जगत में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज भी कराई वरन स्वयं को नाम से लेकर हस्ताक्षर तक स्थापित भी किया। ऐसे ही एक नाम आदरणीया पूर्णिमा वर्मन जी से हम मिलेंगे कल शिवोहम साहित्यिक मंच के फेसबुक पेज पर जिनके गीत उनको हिंदी की कवयित्रियों में विशेष स्थान दिलाते हैं। उनके गीतों का स्त्री विमर्श, उनके गीतों की श्रंगारिकता, शब्द चयन, विषय वैविध्य सब कुछ अद्भुत है। वे श्रोताओं के साथ साथ पाठकों की भी प्रिय हैं।
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये कल सुनते हैं डॉ कुँवर बेचैन जी को। वर्तमान की मंचीय काव्य परंपरा में अग्रणी, सुमधुर प्रस्तोता डॉ कुंवर बेचैन जी वास्तव में गीतकुंवर हैं। उनके गीतों का वैविध्य, और प्रतीक योजना तो अद्भुत है ही साथ में उनका स्वर उसमें और अधिक सौंदर्य वृद्धि कर देता है। वे गीतों के साथ लोकरंजन व लोकमंगल दोनों की कार्य सम्पादित करने में सक्षम हैं। आइये हिंदी गीतिकाव्य के अलंकारिक स्वर को सुनें
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में कल सुनिये पूर्णिमा वर्मन जी को। हिंदी कविता सहित्य विधा है जिसका दरवाज़ा महिलाओं नें समय समय पर खटखटाया भी है और अधिकारपूर्वक उसमे दाखिल भी हुई हैं। कहीं माँ मीरा नें अपने मोहन को पुकारा तो उनके शब्द माधुर्य के आगे बड़े बड़े तपस्वियों का तप फीका पड़ गया। कहीं श्रद्धेया महादेवी की अपनी पीड़ा गीतों में मुखर होकर हमारे सामने आई तो पूरे संसार को रुला गयी। कहीं आदरेया सुभद्राकुमारी चौहान में अंग्रेजों को झांसी की रानी के स्वर में ललकारा तो पूरा हिंदुस्तान उनके स्वर में स्वर मिला उठा। श्रृंखला में अनगिन नाम हैं जो लिखें जाएं तो समय और स्याही दोनों का अभाव हो जाएगा। उसी श्रंखला में समकालीन अनेक नाम हैं जिन्होंने साहित्य जगत में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज भी कराई वरन स्वयं को नाम से लेकर हस्ताक्षर तक स्थापित भी किया। ऐसे ही एक नाम आदरणीया पूर्णिमा वर्मन जी से हम मिलेंगे कल शिवोहम साहित्यिक मंच के फेसबुक पेज पर जिनके गीत उनको हिंदी की कवयित्रियों में विशेष स्थान दिलाते हैं। उनके गीतों का स्त्री विमर्श, उनके गीतों की श्रंगारिकता, शब्द चयन, विषय वैविध्य सब कुछ अद्भुत है। वे श्रोताओं के साथ साथ पाठकों की भी प्रिय हैं।
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये आज सुनते हैं वरिष्ठ गीतकार श्री माहेश्वर तिवारी जी को। श्री माहेश्वर तिवारी जी हिंदी गीतकाव्य परम्परा के उन गीतकारों में से हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन गीतों को समर्पित किया। उनके गीतों को पढ़कर, उनकी शैली से प्रेरणा ले न जाने कितने कवि तैयार हुए। आप गीत को मंत्र की भाँति मारक बनाने में निष्णात हैं। आपके नवगीतों का प्रकृति चित्रण इतना सजीव है कि जैसे प्रकृति स्वयं देह धारण होकर वार्तालाप कर रही हो। मंचों पर गीत धारा को निष्कलुष, और जीवंत रखने में आपका योगदान अतुलनीय है।
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये आज सुनते हैं श्री बलराम श्रीवास्तव जी को। पिछले बीस वर्षों में हिंदी कविता के मंचों नें तमाम बदलाव देखे हैं। मंचों की शालीनता और गंभीरता का दुशाला धीरे – धीरे उतारा गया और एक समय ऐसा भी लगा जब लगा कि अब मंच से साहित्य रूपी चादर के खींचकर फेंक ही दिया जाएगा, उस कठिन समय में भी कई रचनाकार ऐसे रहे जिन्होंने अपने मूल्यों से समझौता कभी नहीं किया और श्री बलराम श्रीवास्तव जी उनमें से एक हैं। आदरणीय बलराम जी को सुनकर वह सभी सीख सकते हैं जिन्हें यह लगता है कि कविता की गंभीरता समाप्त करके ही आप मंचों की ऊंचाइयों को छू सकते हैं। आपके गीत साहित्यिक रूप से समृद्ध तो हैं ही साथ में आपका अद्भुत स्वर आपके गीतों को सम्मोहक स्वरूप प्रदान कर देता हैं। आपके गीतों का सस्वर पाठ ऐसा लगता है मानों किसी ने कानों में मिश्री घोल दी हो आपके गीतों की गंगा में आचमन कर मन पवित्र हो उठता है। बात चाहे श्रृंगार की हो , दर्शन की हो अथवा देशभक्ति की आपके गीतों नें हर पहलू को बड़े सलीके से छुआ भी है और उत्कृष्टता के सोपान तक पहुँचाया भी है।
शिवोहम साहित्यिक मंच की प्रस्तुति #गीतों_की_ओर में आइये कल सुनते हैं श्री राजेश राज जी को। शिवोहम साहित्यिक मंच अपनी गीत यात्रा में अनेक लब्ध प्रतिष्ठित गीतकारों को आपके मध्य ला चुका है और आप सबके सहयोग और उत्साहवर्धन से यह यात्रा अनवरत जारी है। इस तरह के आयजनों का उद्देश्य मात्र मनोरंजन नहीं है बल्कि यह है कि जो आक्षेप हिंदी मंच पर लगते रहे कि कविता समाप्त हो गयी या मृतप्राय है उन सबका पटाक्षेप करना है क्योंकि हिंदी के पास आज भी वो तमाम साधक है जो सतत अपनी साहित्य साधना में लगे हुए हैं और माँ हिंदी के कोष में वृद्धि कर रहे हैं। श्री राजेश राज जी भी उन रचनाकारों में से हैं जिन्होंने सदैव ही साहित्य में सृजन करते समय उत्कृष्टता को प्राथमिकता दी। उन्होंने अपने मानक स्वयं निर्धारित किए और साहित्यिक जगत की नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय रास्ता भी बनाया। आइये उनके गीतों की रचनात्मकता, उनके कला कौशल और उनकी विलक्षण भाव प्रवणता को सुनें
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