श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 16
दैवासुर सम्पद्विभाग योग
मनुष्य के भीतर दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं—दैवी और आसुरी।
भगवान श्रीकृष्ण गीता के इस महत्वपूर्ण अध्याय में इन दोनों स्वभावों का विस्तार से वर्णन करते हैं।
दैवी गुण जैसे निडरता, सत्य, करुणा, क्षमा, विनम्रता और आत्मसंयम मनुष्य को उन्नति, शांति और मोक्ष की ओर ले जाते हैं। वहीं अहंकार, क्रोध, लोभ, छल, हिंसा और असत्य जैसी आसुरी प्रवृत्तियाँ व्यक्ति को दुःख, अशांति और पतन की ओर धकेलती हैं।
यह अध्याय हमें स्वयं के भीतर झाँकने का अवसर देता है और बताता है कि जीवन में वास्तविक सफलता केवल बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि हमारे चरित्र और आचरण से निर्धारित होती है।
🎧 सुनिए “श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 16 : दैवासुर सम्पद्विभाग योग” और जानिए कि दैवी गुणों को अपनाकर तथा आसुरी प्रवृत्तियों से बचकर हम अपने जीवन को कैसे अधिक सार्थक, शांत और उद्देश्यपूर्ण बना सकते हैं।
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Shrimad Bhagwat Gita adhyay-18 By Sri Anup Jalota
Credit: International Gita society
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Maa Shailputri
नवरात्र के 9 दिन भक्ति और साधना के लिए बहुत पवित्र माने गए हैं। इसके पहले दिन शैलपुत्री की पूजा की जाती है। शैलपुत्री हिमालय की पुत्री हैं। हिमालय पर्वतों का राजा है। वह अडिग है, उसे कोई हिला नहीं सकता। जब हम भक्ति का रास्ता चुनते हैं तो हमारे मन में भी भगवान के लिए इसी तरह का अडिग विश्वास होना चाहिए, तभी हम अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। यही कारण है कि नवरात्र के पहले दिन शैलपुत्री की पूजा की जाती है।
Chants credit- Jyoti upreti sati
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