प्रथम सर्ग – शौर्य प्रदर्शन
रश्मिरथी का प्रथम सर्ग आरम्भ होता है कौरव और पाण्डव राजकुमारों के शक्ति प्रदर्शन से। रंगभूमि में सभी कुमारों के शौर्य को देखकर जनता दंग हो जाती है। तब अचानक आगे आकर कर्ण सभी कुमारों को ललकारते हैं। इस पर उनका कुल – गोत्र जब सभा पूछती है तो वे उत्तर देते हैं
पूछो मेरी जाति शक्ति हो तो मेरे भुजबल से।
रवि समान दीपित ललाट से और कवच कुंडल से।
वाद विवाद के बाद एक तरफ कर्ण को दुर्योधन अंगदेश का राजा बनाते हैं वहीं गुरुवर द्रोण को यह भान हो जाता है कि अर्जुन का मार्ग अब निष्कंटक नहीं रहा।
रक्त मंडल के पिछले भाग में आपने सुना कि मिस्टर कैमिन और गोपाल शंकर मिस रोज़ का पता नहीं लगा पाए। जलालाबाद के किले को उड़ा दिया गया और नगेंद्र नरसिंह अब आगे की कार्यवाही के लिए चिंतित हो गए। क्या मिस रोज़, केमिन और गोपाल शंकर को मिल पायेंगी । जलालाबाद के किले के बाद क्या आगे के किले को रक्त मंडल उड़ाने में कामयाब होगा ? सुनिए इसके आगे का भाग में..।
कहानी में दो अनजान लोग जब विवाह का बंधन बन जाता है ऐसे में क्या होता है ?इस इस बात को कहानी की मुख्यधारा में शामिल किया गया है|कहानी के मुख्य पात्र निशिकांत का विवाह एक साधारण रंग -रूप की युवती रजनी से हुआ है |दोनों पूरी तरीके से एक दूसरे से अपरिचित है| निशिकांत के मन में अपनी नवविवाहिता के लिए कई प्रश्न गूंज रहे हैं जैसे उसका व्यवहार कैसा होगा ?उसके साथ जीवन की दौड़ में सहारा बन पाएगी ? आदि -आदि | इन सब के बीच एक बात और जुड़ी हुई है |वह क्या है ?इसे जानने के लिए सुनते हैं विष्णु प्रभाकर के द्वारा लिखी गई कहानी अपरिचित नयनी दीक्षित की आवाज में|
सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर धृतराष्ट्र सत्य और असत्य को असत्य कहकर अपने नीर-क्षीर विवेक का परिचय देते हैं। वह लोकमत का आदर करते हुए सभासदों को शान्त करते हुए कहते हैं वे यह भी स्वीकार करते हैं कि विश्व के सन्तुलित विकास के लिए हृदय और बुद्धि का समन्वित विकास आवश्यक है। वह दुर्योधन को आदेश देते हैं कि पाण्डवों को मुक्त कर दो एवं उन्हें उनका राज्य लौटा दो।
क़त्ल का राज़ – महेश दुबे – नयनी दीक्षित
कहानी में गुरूबख़्श मंगतानी सेठ का कत्ल हो जाता है ।इस कत्ल का इल्जा़म उसका दोस्त बाबलानी अपने ऊपर ले लेता है। किंतु जब कहानी से कई राज़ की परतें खुलती है तो क्या वास्तव में बाबलानी सेठ मंगतानी का कातिल होता है या कोई ?और अगर कोई और है तो बाबलानी ने अपने ऊपर इल्जा़म क्यों ले क्यों लिया? बेहद रोमांचक और रहस्य से भरपूर कहानी जानिए नयनी दीक्षित की आवाज़ में ,लेखक महेश दुबे की लिखी कहानी कत्ल का राज में आखिर क्या होता है?
सत्य की जीत के इस प्रसंग में द्युत सभा में युधिष्ठिर जब द्रौपदी को भी हार जाते हैं तब दुशासन द्वारा द्रौपदी का द्युत सभा में चीरहरण करने के आगे बड़ने पर भी समस्त धर्माचार्य भीष्म पितामह ,द्रोणाचार्य ,विदुर सहित सभी इस दृश्य को देख मौन हैं ऐसे में सिर्फ कौरवों में विकर्ण पुरज़ोर विरोध करता है ऐसे में कर्ण क्या कहता है। द्वारिका प्रसाद महेश्वरी के द्वारा लिखी गई महाभारत में द्युत सभा का वर्णन नयनी दीक्षित की आवाज़ में
छठे सर्ग की कथावस्तु हमे युद्धभूमि की ओर ले जाती है जहाँ अब कर्ण कौरव सेना का सेनापति है। श्रीकृष्ण को ज्ञात है कि जब तक कारण के पास देवराज इंद्र द्वारा प्रदत्त एकघ्नी शक्ति है तब तक पाण्डवों की विजय का मार्ग प्रशस्त नहीं है। अतः वह महावीर भीम पुत्र घटोत्कच को रण में आहूत करते हैं। उसके आते ही कौरव सेना में हाहाकार मच जाता है। तब दुर्योधन कर्ण से निवेदन करते हैं
दाहक प्रचंड इसका बल है,
यह मनुज नहीं कालनल है।
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तू नहीं जोश में आएगा,
आज ही समर चूक जाएगा।
अंततः कर्ण सेनापति के धर्म का निर्वाह करते हुए अमोघ एकघ्नी शक्ति का संधान करते हैं और घटोत्कच वीरगति को प्राप्त होता है। दिवस निश्चय ही कौरवों के नाम होता है पर कर्ण को ज्ञात है कि भविष्य अब पाण्डवों का हो चुका है।
हारी हुई पाण्डव चमू में हँस रहे भगवान थे।
पर जीत कर भी कर्ण के हारे हुए से प्राण थे।
द्वितीय सर्ग में उच्चकुलाभिमानी राजवंश की उपेक्षा के दंश से ग्रसित कर्ण धनुर्विद्या सीखने के लिए महर्षि परशुराम की शरण में जाते हैं। परंतु वहाँ वह अपने सूत पुत्र होने की पहचान छिपा लेते हैं। सारी विद्याएं सीखने के उपरांत एक दिवस काल का कराल चक्र चलता है और कर्ण की पहचान से पटाक्षेप हो जाता है तब महर्षि परशुराम कर्ण को श्राप देते हैं
सिखलाया ब्रह्मास्त्र तुझे जो काम नहीं वह आएगा।
है यह मेरा श्राप समय पर उसे भूल तू जाएगा।।
चतुर्थ सर्ग – महादान
चतुर्थ सर्ग में देवराज इंद्र ब्राह्मण वेश में प्रातः काल सूर्योपासना के समय कर्ण के पास आते हैं और कर्ण से कवच और कुंडल दान में मांगते हैं। संकल्पबद्ध कर्ण उन्हें अपने कवच और कुंडल दान करते हैं। कर्ण के व्रत को देख देवराज इंद्र कर्ण को महादानी, पवित्र और सुधि जबकि अपने आप को प्रवंचक, कुटिल और पापी जैसी संज्ञाएँ देते हैं। ग्लानि में आकंठ डूबे देवराज इन्द्र कर्ण को एकघ्नी शक्ति वरदान में प्रदान करते हैं।
‘दानवीर! जय हो, महिमा का गान सभी जन गाये,
देव और नर, दोनों ही, तेरा चरित्र अपनाये.’
दे अमोघ शर-दान सिधारे देवराज अम्बर को,
व्रत का अंतिम मूल्य चुका कर गया कर्ण निज घर को।
तृतीय सर्ग – कृष्ण संदेश
रश्मिरथी के सभी सर्गो में यह सर्ग सर्वाधिक लोकप्रिय सर्ग है। संभावित युद्धजनित महाविनाश को टालने के लिए स्वयं योगिराज कृष्ण कौरवों के दरबार पहुंचते हैं और पांडव पक्ष की ओर से निवेदन करते हैं
दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खाएंगे,
परिजन पर असि न उठाएंगे।
परंतु हठी दुर्योधन को यह भी स्वीकार नहीं होता। वह तो केवल एक ही हठ पर अडिग था कि “सूच्याग्रं नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव।” और अभिमान वश वह श्रीकृष्ण को बंधक बनाने का असफल प्रयास भी करता है। अंत में श्रीकृष्ण यह भी प्रयास करते हैं कि कर्ण पाण्डव पक्ष में सम्मिलित हो जाये क्योंकि वह पांडवों का बड़ा भाई है, परंतु इस प्रयास में भी असफल हो उन्हें रिक्त – कर वापस आना पड़ता है।
पांचवां सर्ग – मातृ विनय
पंचम सर्ग में कुंती स्वयं कर्ण के पास जाकर अपना मातृत्व प्रदर्शित करने का प्रयास करती हैं। वह कर्ण से आग्रह करती हैं कि कर्ण पाण्डवों के विपक्ष में होकर अपने ही सगे भाइयों के विरुद्ध शस्त्र संधान न करे।
इस पर कर्ण पाण्डव पक्ष में सम्मिलित होने से तो मना कर देता है परंतु कुंती को इस वचन से साथ विदा करता है कि समय आने पर वह अर्जुन के सिवा किसी पाण्डव को नहीं मारेगा। इस प्रकार कुंती के पुत्रों की संख्या पाँच ही बनी रही रहेगी। और इसी तरह कुंती खाली हाथ वहाँ से वापस चल देती हैं।
हो रहा मौन राधेय चरण को छूकर,
दो बिंदु अश्रु के गिरे दृगों से चूकर।
बेटे का मस्तक सूँघ बड़े ही दुख से,
कुंती लौटी कुछ कहे बिना ही मुख से।
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