Maa Chandraghanta
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा होती है।चन्द्रघंटा देवी का स्वरूप तपे हुए स्वर्ण के समान कांतिमय है।चेहरा शांत एवं सौम्य है और मुख पर सूर्यमंडल की आभा छिटक रही होती है। माता के सिर पर अर्ध चंद्रमा मंदिर के घंटे के आकार में सुशोभित हो रहा जिसके कारण देवी का नाम चन्द्रघंटा हो गया है।अपने इस रूप से माता देवगण, संतों एवं भक्त जन के मन को संतोष एवं प्रसन्न प्रदान करती हैं। मां चन्द्रघंटा अपने प्रिय वाहन सिंह पर आरूढ़ होकर अपने दस हाथों में खड्ग, तलवार, ढाल, गदा, पाश, त्रिशूल, चक्र,धनुष, भरे हुए तरकश लिए मंद मंद मुस्कुरा रही होती हैं। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाईं देने लगती हैं। इन क्षणों में साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए। इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। इसलिए हमें चाहिए कि मन, वचन और कर्म के साथ ही काया को विहित विधि-विधान के अनुसार परिशुद्ध-पवित्र करके चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना करना चाहिए। इससे सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते हैं। यह देवी कल्याणकारी है।मां चंद्रघंटा की पूजा करने से जातक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जन्म-जन्म का डर समाप्त हो जाता है और जातक निर्भय बन जाता हैं।
Chants credit- Jyoti upreti sati
पुदुचेरी जो पांडिचेरी के नाम से भी जाना जाता है ।भारत के दक्षिण का एक केंद्र शासित प्रदेश का एक शहर है। आज भी फ्रांसीसी संस्कृति की झलक यहां लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। यहां के प्राकृतिक दृश्य, खूबसूरत समुद्री तट ,यहां की संस्कृति यह सारी बातें पर्यटकों को अपने मोह में बांध लेने के लिए काफी है ।शांति की तलाश में पर्यटकों की पहली पसंद के लिए वाले जाना जाने वाला यह शहर और उसके आसपास के कई पर्यटक स्थलों के बारे में क्या आप ऐसे खूबसूरत जगह के बारे में और नहीं जानना चाहेंगे, तो सुनिए घुमंतू की श्रृंखला से संजय शेफर्ड की डायरी सै भारत की फ्रेंच कैपिटल पुदुचेरी और शांत समुद्र का किनारा ,पल्लवी गर्ग की आवाज़ में…
अंडमान -निकोबार द्वीप समूह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए दुनिया भर में जाना जाता है ।यहां के साफ-सुथरे वातावरण हरियाली और समुद्री तटों की वज़ह से यहां पर पर्यटक खींचें चले आते हैं। यह द्वीप प्रकृति प्रेमियों का स्वर्ग और गार्डन ऑफ ईडन कहलाता है। यह प्रकृति के द्वारा दिया गया एक खूबसूरत तोहफा है जो 572 दीपों से बना है। तटों के सफेद रेत, समुद्र का नीला पानी और चारों तरफ फैली हरियाली प्रकृति ने क्या गज़ब की खूबसूरती बक्शी है। इसकी खूबसूरती के बारे में, और यहां के मौसम ,त्योहारों के बारे में बहुत कुछ जानने के लिए सुनिए संजय शेफर्ड के द्वारा लिखी गई कवर स्टोरी पल्लवी की आवाज़ में
सृष्टि संकल्प – भाग -3
Dr. Dharmveer भर्ती जी द्वारा रचित कृति कनुप्रिया का ये तृतीय खंड है
सृष्टि संकल्प में तीन कविताएँ हैं
कृष्ण जा चुके हैं
राधा विरह के दर्द से उद्वेलित है। वो नही समझ पा रही है कि अगर वो अपने कनु के मन में बसती है, और निखिल सृष्टि वो खुद है, यदि महासाग, हिमशिखर, मेघ घटाएं, सबमें वो ही व्याप्त है, तो फिर वो एकांत में भयभीत क्यों हो जाती है?
राधा विरह के क्षणों में वेदना से, आग्रह से, दर्द से अपने कनु को बार बार यही ज्ञात करने में प्रयत्नशील रहती है कि समस्त सृष्टि में बस राधा है और उसका कनु
राधा का मानसिक उद्वेलन व द्वंद अत्यंत खूबसूरती से इन तीनो कविताओं से व्यक्त होता है
पूर्वराग – भाग -1
Dr. Dharmveer भर्ती जी द्वारा रचित कृति कनुप्रिया का ये प्रथम खंड है
पूर्वराग के पांचों गीत राधा के निश्चल मन की सम्वेदना को प्रकट करते हैं.
भोली राधा, प्रतीक्षा में खड़े छायादार अशोक वृक्ष से असमंजस्य से पूछती है कि वह क्यों उसकी, यानी कनुप्रिया की प्रतीक्षा में कई जन्मों से पुष्पहीन खड़े हैं? राधा के सौन्दर्य, नारी सुलभ लज्जा एवं पुलक का खूबसूरत चित्रण है.
कनु अर्थात कृष्ण का प्रेम आत्मा का प्रेम है, समर्पण का प्रेम है.
इन गीतों में राधा के प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति है. राधा के प्रेम में निश्छल भावनाओं की स्थिति है. प्रकृति के कण कण में कनु की छवि देखना, यमुना में नहाते समय कृष्ण को निहारना, गृहकार्य से अलसाकर कदम्ब की छांह में शिथिल अनमनी पड़ी रहना- जैसे अनेक भाव प्रेषण चित्रण इन गीतों में झिलमिलाए हैं.
चलिए गाथा पर सुनते हैं कनुप्रिया का पहला खंड पूर्वराग, पल्लवी की आवाज़ में
samaj ki buraiyon aur kaise ladkiyaan purush pradhaan samaj mein aaj ke samay mein bhi apni pehchaan dhoondh rahee hain… yeh ek sochne yogya baat hai… cover page: ek ladki, old man, table pe rakhha chai ka cup
Maa Mahagauri
महागौरी नवदुर्गाओं में आठवां रूप हैं और अष्टमी के दिन पूजी जाती हैं। उनका रंग सफेद होता है और उन्हें चंदन और कमल की माला से प्रसन्न किया जाता है। महागौरी की दो हाथ होते हैं, एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में वरदान करने वाले हिरण का मुँह लेकर हैं। उनका वाहन वृषभ होता है। महागौरी का अर्थ होता है “अति उज्जवल” जो उनकी शुद्धता को दर्शाता है। उन्हें पूजा करने से स्त्रीशक्ति में वृद्धि होती है और सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है।
मानव है मेरे राम – Episode -19 – Dr. Pradeep Dixit
मानव हैं मेरे राम- राम की अनसुनी कहानी प्रदीप दीक्षित की जुबानी l
Shrimad Bhagwat Gita adhyay-11 By Sri Anup Jalota
Credit: International Gita society
श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 18
मोक्ष-संन्यास योग
महाभारत के युद्धक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह अंतिम और सबसे व्यापक उपदेश है। अध्याय 18 में श्रीकृष्ण त्याग, संन्यास, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष के गूढ़ रहस्यों को सरल शब्दों में समझाते हैं।
यह अध्याय बताता है कि सच्चा संन्यास कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि उनके फल की आसक्ति का त्याग है। मनुष्य अपने स्वभाव और कर्तव्य के अनुसार कर्म करते हुए भी आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन का अंतिम संदेश देते हुए कहते हैं कि जब मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ ईश्वर की शरण में आता है, तब वह सभी बंधनों से मुक्त होकर परम शांति और मोक्ष को प्राप्त करता है।
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” जैसे अमर उपदेशों से युक्त यह अध्याय गीता का सार माना जाता है, जो जीवन में कर्तव्य, समर्पण और आत्मबोध का मार्ग दिखाता है।
🎧 सुनिए श्रीमद्भगवद्गीता का अठारहवाँ अध्याय – मोक्ष-संन्यास योग, और जानिए जीवन, कर्म और मुक्ति के अंतिम सत्य को — केवल Gaatha पर।
Shrimad Bhagwat Gita adhyay-18 By Sri Anup Jalota
Credit: International Gita society
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