श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 16
दैवासुर सम्पद्विभाग योग
मनुष्य के भीतर दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं—दैवी और आसुरी।
भगवान श्रीकृष्ण गीता के इस महत्वपूर्ण अध्याय में इन दोनों स्वभावों का विस्तार से वर्णन करते हैं।
दैवी गुण जैसे निडरता, सत्य, करुणा, क्षमा, विनम्रता और आत्मसंयम मनुष्य को उन्नति, शांति और मोक्ष की ओर ले जाते हैं। वहीं अहंकार, क्रोध, लोभ, छल, हिंसा और असत्य जैसी आसुरी प्रवृत्तियाँ व्यक्ति को दुःख, अशांति और पतन की ओर धकेलती हैं।
यह अध्याय हमें स्वयं के भीतर झाँकने का अवसर देता है और बताता है कि जीवन में वास्तविक सफलता केवल बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि हमारे चरित्र और आचरण से निर्धारित होती है।
🎧 सुनिए “श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 16 : दैवासुर सम्पद्विभाग योग” और जानिए कि दैवी गुणों को अपनाकर तथा आसुरी प्रवृत्तियों से बचकर हम अपने जीवन को कैसे अधिक सार्थक, शांत और उद्देश्यपूर्ण बना सकते हैं।
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