Credit: Josh Talk
धीरेंद्र अस्थाना की कहानी पतन बोध में, इंसान पूरी दुनिया से झूठ बोल सकता है लेकिन क्या वह अपने आप से झूठ बोल सकता है ?इंसान जब अकेला होता है खासतौर पर मानसिक रूप से अकेला तो वह सारे सच उसके सामने आते हैं जिनसे वह सारी जिंदगी बचता रहा है लेकिन यही सच क्या कभी-कभी उसके पतन का कारण बनते हैं या नहीं ?
कविता के अंश में सिंदूरी शाम की सुंदरता का वर्णन किया गया है
बड़े बुजुर्ग घर की शान होते हैं उनकी बातों में एक तजुर्बा होता है उनके सानिध्य में सब कुछ कितना सरल हो जाता है बच्चों के लिए उनकी दादी तो पूरा स्नेह का खजाना होती है इसी रिश्ते के मधुर संबंधों काअवलोकन कराती हुई कविता है दादी पल्लवी की आवाज में
एक छोटे बच्चे की पूरी दुनिया उसकी मां में बसी होती है वह अपनी हर छोटी -बड़ी बात के लिए सिर्फ अपनी मां पर ही निर्भर रहता है किंतु जैसे समय के साथ वह परिपक्व होने लगता है वह मां जो दुनिया का ज्ञान उसे दे रही थी, आज अपने बच्चों से ही हर बात पूछती है ?क्या इस बदलाव में उन दोनों के बीच का स्नेह का बंधन वैसा ही रहता है? जानते हैं इस खूबसूरत अनुभव को, अंगोना साहा के साथ
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